Saturday, April 28, 2012

-संबल-






नन्ही हथेलियाँ गुदगुदाती रेत,
हर बार मुट्ठियों से सरक जाती है
और वह,
उसे मुट्ठियों में भींच
वहां पहुँच जाता है,
जहाँ माँ,
उसका महल बनवा रही है .
मैं भी-
हाथों में रेत भर लेती है,
मुट्ठियाँ भिंचने लगती हैं
वह सरककर डह जाती है.
फिर अंजुरी में भर उसे
हवा के सुपुर्द कर देती हूँ.
पारदर्शी होती रेत ,
चारों ओर भुरभुरा जाती है ....
क्षणार्ध के लिए -
सूरज कई कणों में विभक्त हो जाता है !
और मैं
थककर उस ओर बढ़ जाती हूँ
जहाँ तुम,
एक और महल बनवा रहे हो!!!

27 comments:

  1. और मैं
    थककर उस ओर बढ़ जाती हूँ
    जहाँ तुम,
    एक और महल बनवा रहे हो!!!

    गहन भाव... सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार

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  2. वाह.............

    बहुत सुंदर...
    गहन भाव लिए रचना,,,

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  3. बहुत गहन..बहुत सुन्दर प्रस्तुति.........मेरा भी.वाह:वाह: तो बनता है......सारस जी

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  4. सूरज कई कणों में विभक्त हो जाता है !
    और मैं
    थककर उस ओर बढ़ जाती हूँ
    जहाँ तुम,
    एक और महल बनवा रहे हो!!!

    बहुत ही प्यारी लाइन्स हैं आंटी!

    सादर

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  5. नन्ही हथेलियाँ गुदगुदाती रेत,
    हर बार मुट्ठियों से सरक जाती है
    और वह,
    उसे मुट्ठियों में भींच
    वहां पहुँच जाता है,
    जहाँ माँ,
    life is like a wave. THE TRUTH OF LIFE.

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  6. और मैं
    थककर उस ओर बढ़ जाती हूँ
    जहाँ तुम,
    एक और महल बनवा रहे हो!!!
    अनुपम भाव संयोजित किए हैं आपने इस अभिव्‍यक्ति में ।

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  7. speechless.....amazing....its pleasure to read your blog.

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  8. वाह क्या बात है
    अरुन (arunsblog.in)

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  9. भावों की गहराई देखते ही बनती है। अच्छी भावपूर्ण रचना।

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  10. वाह .. बहुत सुन्दर
    रेतीले एहसास

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  11. सपनों के महल की शरुआत.....रेत के महल से ही होती है|
    शुभकामनाएँ!

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  12. बिम्ब अच्छे लगे . सुन्दर कविता .

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  13. बहुत भावपूर्ण रचना है |
    आशा

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  14. बहुत खूबसूरत रचना :)
    मुट्ठी में रेत सी फिसल जाती है |
    पल भर को हथेली में कभी ठहरती ही नहीं |
    हाँ इसी का नाम तो जिन्दगी है कितनी भी कोशिश कर लो पर रेत कि तरह फिसलती ही रहती है |

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  15. रोक लिया है सुन्दर बिम्ब और खुबसूरत भाव ने...

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  16. पारदर्शी होती रेत ,
    चारों ओर भुरभुरा जाती है ....
    क्षणार्ध के लिए -
    सूरज कई कणों में विभक्त हो जाता है !


    kavita ki kendreey panktiyaan

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  17. बहुत सुंदर । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । । धन्यवाद ।

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  18. गहरे भाव ... बच्चे सामान चाहत फिर से नए महल बनाने कों प्रेरित करती है ... वो थकता नहीं है रेत के फिसल जाने से ... आशा की करणों कों पकड़ने में लग जाता है ...

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  19. बहुत सुन्दर, भावपूर्ण रचना!

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  20. बहुत ही संवेदनशील रचना...
    भाव बड़ी अच्छी तरह मुखरित हुए हैं..

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  21. पारदर्शी होती रेत ,
    चारों ओर भुरभुरा जाती है ....
    क्षणार्ध के लिए -
    सूरज कई कणों में विभक्त हो जाता है.

    अच्छी भावपूर्ण रचना.

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  22. आज तलक वो मद्धम स्वर
    कुछ याद दिलाये कानों में
    मीठी मीठी लोरी की धुन
    आज भी आये, कानों में !
    आज जब कभी नींद ना आये,कौन सुनाये मुझको गीत !
    काश कहीं से मना के लायें , मेरी माँ को , मेरे गीत !

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  23. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  24. बहुत सुन्दर प्रस्‍तुति।

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  25. bahut hi gare bhav aur sunder bimbon ke sath behatarin pratuti...

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