Thursday, November 28, 2013

समंदर



देखे हैं कई समंदर
यादों के  -
प्यार के -
दुखों के -
रेत के -
और सामने दहाड़ता-
यह लहरों का समंदर !
हर लहर दूसरे पर हावी
पहले के अस्तित्व को मिटाती हुई...

इन समन्दरों से डर लगता है मुझे .
जो अथाह है 
वह डरावना क्यों हो जाता है ?
अथाह प्यार-
अथाह दुःख-
अथाह अपनापन-
अथाह शिकायतें.......

इनमें डूबते ..उतराते -
सांस लेने की कोशिश करते -
सतह पर हाथ पैर मारते
रह जाते हैं हम -
और यह सारे समंदर
जैसे लीलने को तैयार
हावी होते रहते हैं .

और हम बेबस, थके हुए लाचार से
छोड़ देते हैं हर कोशिश
उबरने की
और तै करने देते हैं
समन्दरों को ही
हमारा हश्र.....!! 

           


Thursday, November 21, 2013

मैं



मैं कि अपनी सोच ...
अपनी पहचान है ,
मैं चेतना का उद्गम है
मैं अपने आप में पूरा ब्रह्माण्ड है -
इसके अपने नियम
अपनी परिभाषाएं हैं
अपने स्वप्न
अपनी अभिलाषाएं हैं -
मैं वह बीज है
जो दुनिया का गरल पी सकता है
मैं वह शक्ति
जो उसे भस्म भी कर सकता है -
मैं वह दीप
जो जलता है कि अंधकार मिटे
मैं वह दम्भ !
जो कायनात जलाके राख करे -
मैं वह वज्र   
जो घातक  भी है
रक्षक भी
मैं वह निमित्त
जो सृष्टि को गतिमान करे !



Tuesday, November 19, 2013

...........पता नहीं !




अब तो केवल यादें हैं
उनके सिवा कुछ भी नहीं
वक़्त ने मुझको गुज़ारा
या मैंने वक़्त को -पता नहीं !

धुंधली सी परछाइयाँ
आ घेर लेतीं मुझको जब
धुंधली होतीं शामें तकता
सोचता क्या- पता नहीं !

कौनसी थी वह ख़ता
अनजाने में मुझसे हो गयी
छोड़कर सब चल दिए
क्यूँ जी रहा मैं  -पता नहीं !

वादा खिलाफी मैंने की
यह मान मैं सकता नहीं
कोशिशों में रह गयी
शायद कमी -पता नहीं !

अब तो अकेले रहने की
आदत है मुझको पड़ गयी
रौशनी कब मेरी थी
कब मेरी होगी -पता नहीं !

Sunday, November 10, 2013

लहरें ......

लहरों को देखकर अक्सर मन में कई विचार कौंधते हैं .....



समंदर के किनारे बैठे
कभी लहरों को गौर से देखा है
एक दूसरे से होड़ लगाते हुए ..
हर लहर तेज़ी से बढ़कर ...
कोई  छोर  छूने  की पुरजोर  कोशिश  करती 
फेनिल सपनों के निशाँ छोड़ -
लौट आती -
और आती हुई लहर दूने जोश से
उसे काटती हुई आगे बढ़ जाती
लेकिन यथा शक्ति प्रयत्न के बाद
वह भी थककर लौट आती
.......बिलकुल हमारी बहस की तरह !!!!!


             ()

कभी शोर सुना है लहरों का ....
दो छोटी छोटी लहरें -
हाथों में हाथ डाले -
ज्यूँ ही सागर से दूर जाने की
कोशिश करती हैं-
गरजती हुई बड़ी लहरें
उनका पीछा करती हुई
दौड़ी आती हैं -
और उन्हें नेस्तनाबूत कर
लौट जाती हैं -
बस किनारे पर रह जाते हैं -
सपने-
ख्वाईशें -
और जिद्द-
साथ रहने की ....
फेन की शक्ल में ...!!!!!

           ( )

लहरों को मान मुनव्वल करते देखा है कभी !
एक लहर जैसे ही रूठकर आगे बढ़ती है
वैसे ही दूसरी लहर
दौड़ी दौड़ी
उसे मनाने पहुँच जाती है
फिर दोनों ही मुस्कुराकर -
अपनी फेनिल ख़ुशी
किनारे पर छोड़ते हुए
साथ लौट आते हैं
दो प्रेमियों की तरह....!!!!!

                      ( )

कभी कभी लहरें -
अल्हड़ युवतियों सी
एक स्वछन्द वातावरण में
विचरने निकल पड़तीं हैं ---
घर से दूर -
एल अनजान छोर पर !
तभी बड़ी लहरें 
माता पिता की चिंताएं -
पुकारती हुई
बढ़ती आती हैं ...
देखना बच्चों संभलकर 
यह दुनिया बहुत बुरी है
कहीं खो जाना 
अपना ख़याल रखना -
लगभग चीखती हुई सी
वह बड़ी लहर उनके पीछे पीछे भागती है ...
लेकिन तब तक -
किनारे की रेत -
सोख चुकी होती है उन्हें -
बस रह जाते हैं कुछ फेनिल अवशेष 
यादें बन .....
आंसू बन ......
तथाकथित कलंक बन ....!!!!!  


       सरस दरबारी

Tuesday, October 8, 2013

विरह





"कागा सब तन खइयो...चुन चुन खइयो माँस
दो नैना मत खइयो ...मोहे पिया मिलन की आस "

......
सुना था कभी !
और उस पराकाष्ठा को समझना चाहा था,
जो विरह की वेदना से उगती है -
और उसे उस दिन जाना -
जब सीमा पर तुम्हारे लापता होने की खबर आयी-
जैसे सब कुछ भुर भुरा कर ढेह गया !!
बस एक आस बाक़ी थी
जो खड़ी रही
मजबूती से पैर जमाये -
पांवों के नीचे से फिसलती रेत को
पंजों से भींचती हुई ..
कहती हुई -
"तुम आओगे ज़रूर ..."
मैं आज भी आँखों में दीप बाले बैठी हूँ -
वह आस..
आज भी चौखट से लगी बैठी है ...!!!

Thursday, September 26, 2013

नियति

 

नियति के विस्तृत सागर में
कब कौन कहाँ तर पाया है -
जिसको चाहा , रौंदा उसने
और पार किसीको लगाया है .
पेशानी पर जो लिखा है -
बस पेश उसीको आना है
कितना भी तुम लड़ लो भिड़ लो
उसका ही सच अपनाना है .
क्या देव और यह दानव क्या-
कोई भी बच न पाया है -
फिर तुम तो केवल इंसान हो -
सब पर नियति का साया है                                                                                                                                                                                                                                                
होता न ऐसा तो पांडव
क्यों दर दर भटके भेशों में -
महारानी द्रौपदी क्यों बन गयी-
सैरंध्री कीचक के देश में .
क्यों राम ने छोड़ा देस अपना -
और भटके जंगल जंगल में
था राज तिलक होना जिस दिन
वे निकले वन्य प्रदेश में.
 बस नियति ही करता धर्ता
उसके आगे सब बेबस हैं
फिर कौन गलत और कौन सही -
सब परिस्थितियों के फेर हैं .


Thursday, September 19, 2013

विरह



विरह का बीज तो उसी दिन पड़ गया था -
जब तुमने अचानक हाथ छुड़ाकर
जाने का फरमान सुनाया था
और मैं लम्हों को छील छीलकर -
अपनी गलती ढूंढता रहा था .....
 वह फरमान ..!
जैसे मौत की सज़ा सुनाकर 
कलम तोड़ दी थी तुमने ..!!

आज वह बीज
एक वृक्ष बन गया है
और मैं यहाँ बैठा
राहगीरों को विरह्के फल
तोड़ने से रोकता
आज भी तुम्हारी बाट जोह रहा हूँ
पता नहीं क्यों ...!!!

Sunday, September 15, 2013

सौवीं पोस्ट




आज अपनी सौवीं पोस्ट लिख रही हूँ...जब २ फ़रवरी १९१२ में मैंने अपनी पहली पोस्ट लिखी थी ...तब एक आशंका  ... एक झिझक जकड़े हुए थी ...पता नहीं लिख भी पाऊँगी कि नहीं, कोई पढ़ेगा भी कि नहीं...अपनी बात कह भी पाऊँगी कि नहीं .....
कॉलेज के ज़माने में लिखती थी ...उसके बाद विवाह हुआ ....और एक रोक लग गयी...सोच में ..कल्पना शक्ति में .....गुलाब के सुर्ख लाल रंग में मिर्च का रंग दिखाई देने लगा और सरसों के खेत घर की चारदीवारी में खो गए ...और फिर एक लम्बा अन्तराल ...३० साल बाद फिरसे लेखनी उठाई .....डरते ....सहमते ...
जब धीरे धीरे लोगों ने जाना, सराहा , पोस्ट को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दी ....तो बहोत ख़ुशी हुई .....हिम्मत बढ़ी ....और मैंने अपने विचारों को परवाज़ देदी ...
फिर दोस्त बने....इस आभासी दुनिया में कुछ ऐसी शक्सियतें मिलीं ......जो बहुत अन्तरंग मित्र बन गयीं ...इनसे बहोत कुछ सीखा...और सीखती आ रही हूँ......जब सफ़र शुरू किया था तब अकेली थी ...पर अब बहोत सारे मित्रों का यह कारवां मेरी धरोहर ...मेरी ख़ुशी बन गया है ...किसी ने सखी कहा, किसी ने बेटी और किसी ने प्यार और अधिकार से 'दी' कहा तो किसी ने अग्रजा कहकर मान दिया .....
आज  अपनी सौवीं पोस्ट लिखते हुए मुझे बेहद ख़ुशी हो रही है ...मित्रों आपका यह साथ सदा यूहीं बना रहे ...और आपका स्नेह, आपके क्रिटिसिज्म मुझे और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करते रहें ...बस यही चाहती हूँ...

आज बस इतना ही....:) :) :) 

Sunday, September 8, 2013

समंदर




देखे हैं कई समंदर
यादों के  -
प्यार के -
दुखों के -
रेत के -
और सामने दहाड़ता-
यह लहरों का समंदर !
हर लहर दूसरे पर हावी
पहले के अस्तित्व को मिटाती हुई...

इन समन्दरों से डर लगता है मुझे .
जो अथाह है
वह डरावना क्यों हो जाता है ?
अथाह प्यार-
अथाह दुःख-
अथाह अपनापन-
अथाह शिकायतें.......

इनमें डूबते ..उतराते -
सांस लेने की कोशिश करते -
सतह पर हाथ पैर मारते
रह जाते हैं हम -
और यह सारे समंदर
जैसे लीलने को तैयार
हावी होते रहते हैं .

और हम बेबस, थके हुए लाचार से
छोड़ देते हैं हर कोशिश
उबरने की
और तै करने देते हैं
समन्दरों को ही
हमारा हश्र.....!!

         


Thursday, September 5, 2013

मुग़ालते



अच्छा लगता है मुगालतों में जीना
उन एहसासों के लिए
जो आज भी धरोहर बन
महफूज़ हैं कहीं भीतर -
उन लम्हों के लिए
जो छूट गए थे गिरफ्त से ...
जिए जाने से महरूम ...
लेकिन आज भी
उतनी ही ख़ुशी देते हैं !
उन यादों के लिए
जो आज भी जीता रखे हैं
उन अंशों को
जो चेहरे पर उभर आयी मुस्कराहट
का सबब बन जाते हैं ...
हाँ ...मुग़ालते अच्छे होते हैं ...!!!!!

Tuesday, August 27, 2013

अलौकिक प्रेम



राधा के महावरी पांवों को-
माधवने माथे धारा था
तब रुक्मिणी औए सत्यभामा से भी
ऊँचा स्थान दे डाला था -
राधा फिर भी आशंकित सी
कान्हा का प्रेम परखती थी -
जबकि कान्हा ने भक्ति में -
अपना सर्वस्व दे डाला था
है भक्तों को पाना मुझको
तो राधा नाम का स्मरण करें -
भक्ति होगी फलदायक तब
मुझसे पहले उसे नमन करें -
जिसको कहती निर्मोही वह
उसने यह वचन निभाया था -
कान्हा से पहले भक्तों ने
राधा का नाम पुकारा था .
जिस प्रकार सूर्य है कांतिहीन
जब किरणें पास नहीं उसके -
वैसे माधव अस्तित्वहीन
जब राधा साथ न थी उनके
इस दैवी निश्छल प्रेम का अर्थ
भक्तों से सदा अनजाना था -
इस अन्तरंग शक्ति को अपनी
माधवने सर्वस्व दे डाला था .




Monday, August 12, 2013

क्षणिकाएं - (५)



बे वजूद रिश्ते

न जाने कितने रिश्ते
अनाम रह जाते हैं
जीते हैं...बिना वजूद के
यादों में-
टंगे रहते हैं दीवारों पर , तस्वीरों की भीड़ में -
मरते नहीं कभी
न कभी ख़त्म होते हैं
बस , कभी कभी
किसी आह....
किसी सिसकी.....
या कोरों में ठिठकी
नमी में सांस ले लेते हैं
यदा कदा ..!!!!

किरचें

अभी अभी कुछ दरका
पर आवाज़ नहीं हुई
मैंने टुकड़े बुहार दिए
लेकिन कुछ किरचें
दरारों..
अनदेखे कोनों में छिपी रह गयीं -
जो अचक्के में भेदकर
लहू लुहान कर गयीं
भीतर तक..!!!!

Monday, August 5, 2013

लफ्ज़ -



लफ्ज़ तनहा नहीं होते
किसी न किसी एहसास से जुड़े रहते हैं हरदम
कभी छिपी होतीं हैं सरगोशियाँ
कुछ पाक़ लम्हों की
कभी वाबस्ता होती हैं यादें
मौसमी फुहारों की,
जब भीगे थे तन मन तेज़ बौछारों में
और एहसासों की जुम्बिश से
सिहर उठे थे लफ्ज़..!!

लफ्ज़ थिरके भी थे ...
जब ऊँची ऊँची पींगों के साथ
झरते थे गीत सावन के -
और लफ़्ज़ों ने ओढ़ ली थी मायूसी
जब बेवजह पलटकर तुम चले गए थे
उन एहसासों को रौंद .....

आज भी सहमे से लफ्ज़ ताकते हैं
अपने खोहों से -
शायद कोई ख़ुशी इस राह से फिर गुज़रे
और उन्हें अपनी खोई आवाज़ मिल जाये !!!



Sunday, August 4, 2013

शतरंज



कितना खूबसूरत खेल,
सबकी परिधि तय-
सबकी चालें परिभाषित-
ऊंट टेढ़ा चलता है-
हाथी सीधा-
घोड़ा ढाई घर
और प्यादे की छलांग बहुत छोटी
सिर्फ एक खाने भर की
और शातिर दिमाग इन्ही चालों से
तय करते हैं
अंजाम खेल का ..!
काश ! यह खेल तक ही सीमित रहता ..
लेकिन अब
यह जीवन शैली बन गया है -
और जीते जागते इंसान
बन गए हैं मोहरें -
सत्ता करती है सुनिश्चित
किसे हाथी बनाना है
और किसे ऊंट या घोडा...
और आम आदमी
उनकी चालों से बेखबर
उनकी बिछायी बिसात पर
उनकी शै और मात का बायस बन जाता है ...!!!!

                   

Friday, July 26, 2013

एक दूजे का साथ ....





आज सवेरे की ही बात है , पापा नौकरानी से बात कर रहे थे ," हमने तुम्हे कल शाम को देखा था . वहीँ खुसरो बाग़ में अपने पति के साथ टहल रही थीं ".
" हाँ पापाजी गए थे ...कभी कभी समय निकालकर चले जाते हैं "
बात बहुत साधारण थी . शायद मैं भी सुनकर अनसुना कर देती , लेकिन सुशीला (नौकरानी) के लहजे में अपराध बोध मुझे कचोट गया.
अरे घूम रही थी ...तो क्या हुआ.... अपने पति के साथ अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय निकालकर घूम रही थी ...उस में शर्म कैसी ....और अपराध बोध कैसा मानो कोई चोरी पकड़ी गयी हो..!
हम लोगों में कितने लोग ऐसे हैं जो इस बात को अहमियत देते हैं, अपनी व्यस्ततताओं को परे धकेल एक दूसरे के लिए समय निकाल पाते हैं ..?
आंख खुलते ही वही रोज़ का सिलसिला, बच्चों का टिफिन बनाना , स्कूल भेजना, घर के काम निबटाना, खाना बनाना, पति को ऑफिस भेजना, खुद दौड़ते भागते ऑफिस जाना - बसों ट्रेनों में धक्के खाना (और ज़रा समृद्ध हुए तो अपनी कार से जाना )..
फिर लौटकर वही खट राग ...बच्चों की पढ़ाई, शाम के काम...
इस सब में कहीं "हमें इतना समय एक दूजे के साथ गुज़ारना है " क्या इसका का भी समावेश होता है..?
हमारी ज़िन्दगी में वह 'समय' या वह 'स्लॉट' क्या ज़रूरी नहीं है …?
ज़रा सोचिये, बच्चे बड़े होकर अपने अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं ...पढ़ाई, यार दोस्त और फिर शादी . उसके बाद होता है उनका अपना परिवार, पती/पत्नी, बच्चे ...ऐसे में जब वे हमारे लिए समय नहीं निकाल पाते तब हम सोचते हैं 'हमने तो सारी ज़िन्दगी अपने बारे में कभी नहीं सोचा...और आज इनके पास हमारे लिए समय ही नहीं'.
उम्र के इस पड़ाव पर जब हम सबको 'सेटल' कर देते हैं तो पलटकर देखने पर महसूस होता है ...हम 'कितने  'अन्सेटलड'  हो गए हैं. साथ गुज़ारा हुआ समय हमारी पूँजी होता है. यह समय हमारे रिश्तों को मज़बूत करता है , विश्वास बढ़ाता है. यह समय एक आश्वासन है की 'कुछ नहीं बदला'...."आज भी मुझे तुम्हारी उतनी ही ज़रुरत है , जितनी पहले दिन थी ".

इसलिए ज़रूरी है की पती पत्नी आपस में कुछ पल, कुछ घंटे , कुछ समय साथ साथ बिताएं - वरना आप कैसे जान पाएंगे की रिश्तों में अब भी वही संवेदनाएं ..वही एहसास...एक दूसरे के लिए वही ललक बाकी है ...!

Friday, July 19, 2013

सृजन



सृजन करती हूँ
जब भी किसी कविता का -
खोजती हूँ उसे भीतर-
टटोलती हूँ यादों को -
कुछ लम्हों को-
कुछ मिठास -
कुछ कड़वाहटों  को -
कुछ झकझोर देने वाले अहसासों को -
और पाती हूँ एक कविता
दुबकी हुई ..किसी कोने में
उसे सजा संवारकर
एक नया रूप , एक नई पहचान देती हूँ
और देखती हूँ उसे फलता फूलता ...!!!!

Monday, June 24, 2013

हथेलियाँ





यह हथेलियाँ...सच्ची हमदर्द होती हैं
बिना कहे हर बात जान लेती हैं
हर आह...हर सिसकी घुल जाती है इन लकीरों में
जब थके चेहरे को ...वजूद से अपने ढाँप लेती हैं -

दुखते रहते जब थकी पलकों के फाये हैं -
नर्म गदेलियों से हर दर्द वह सोख लेती हैं -
दर्द हजारों जो पपोटों में छिपे बैठे हैं -
उन्हें टूटकर बहने को ज़मीं देती हैं -

जग की रुसवाइयां  जब हद से गुज़र जाती हैं
हिचकियों को वह आँचल में भींच लेती हैं
या परास्त, थकी किस्मत की लकीरों को
फिरसे सहलाकर ..जीने की दिशा देती हैं-

सिर्फ ऐसा नहीं की दुःख ही वह साझा करतीं
हर ख़ुशी में भी साथ देती हैं
शर्म से लाल हो गए गालों को
मोहब्बत भरी आगोश में पनाह देती हैं ...!!!!

Sunday, June 16, 2013

शब्द ही तो हैं .....



हमें और कितना
तोड़ोगे -
मरोड़ोगे-
हमारी सहजता को द्विअर्थी जामा पहना-
और कितना तिरस्कृत करोगे ...!

यूँ तो एक अबोध बालक भी
अपनी हर बात कह लेता है
एक मूक जानवर
अपनी हर ज़रुरत जता देता है,
फिर शब्दों की क्या दरकार...!

हमारी उत्पत्ति, तुम्हारे लिए ही हुई ...
विचारों को बांटने के लिए-
अपनी बात समझाने के लिए
एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए
लेकिन तुमने -
हमारा दुरूपयोग किया..!
हमसे अपना वर्चस्व स्थापित कर
हमीं पर लांछन गढ़ दिया -
कभी लोगों को बरगलाया
झूठे वादों में उन्हें उलझाया
और अर्थों का अनर्थ कर डाला.
जानते थे प्यार की ताक़त को
तुमने फिर भी ज़हर फैलाया
मनों में.....  
सीमाओं पर उसे बोया
और हमको परास्त किया ...!

सुनो ...
अब भी मानो
हमें पहचानो
हम कुछ भी कर सकते हैं
हर ज़ुल्म से दो हाथ कर सकते हैं -
हमें बेचारा ...कमज़ोर, न समझना
हम सियासत का रुख बदल सकते हैं ...!!!

         


Thursday, May 23, 2013

मित्र नीम-




मित्र नीम-
तुम्हें कड़वा क्यों कहा जाता है ....
तुम्हें तो सदा मीठी यादों से ही जुड़ा पाया ...

बचपन के वे दिन जब
गर्मियों की छुट्टियों में 
कच्ची मिटटी की गोद में -
तुम्हारी ममता बरसाती छाँव में ,
कभी कोयल की कुहुक से कुहुक मिला उसे चिढ़ाते -
कभी खटिया की अर्द्वाइन ढीली कर
बारी बारी से झूला झुलाते 
और रोज़ सज़ा पाते
कच्ची अमिया की फाँकों में नमक मिर्च लगा
इंतज़ार में गिट्टे खेलते -
और रिसती खटास को चटखारे ले खाते....

भूतों की कहानियाँ ...हमेशा तुमसे जुड़ी रहतीं 
एक डर..एक कौतुहल ..एक रोमांच -
हमेशा तुम्हारे इर्द गिर्द मंडराता
और हम...
अँधेरे में आँखें गढ़ा
कुछ डरे... कुछ सहमे
तुम्हारे आसपास 
घुंघरुओं के स्वर और आकृतियाँ खोजते ....

समय बीता -
अब नीम की ओट से चाँद को
अठखेलियाँ  करता पाते-
सिहरते ..शर्माते -
चांदनी से बतियाते -
और कुछ जिज्ञासु अहसासों को
निम्बोरियाओं सा खिला  पाते ......

तुम सदैव एक अन्तरंग मित्र  रहे
कभी चोट और टीसों पर मरहम बन 
कभी सौंदर्य प्रसाधन का लेप बन 
तेज़ ज्वर में तुम्हें ही सिरहाने पाया 
तुम्हारे स्पर्श ने हर कष्ट दूर भगाया

यही सब सोच मन उदास हो जाता है
इतनी मिठास के बाद भी
तुम्हें क्यों कड़वा कहा जाता है ...!!!!