Friday, May 25, 2018

मॉर्निंग वॉक – हमारे पूर्वाग्रह




अभी कुछ ही दिन पहले अखबार पढ़ते हुए , एक अजीब सी खबर पर नज़र पड़ी । एक पिता ने अपने बेटे के दसवीं फ़ेल होने पर दावत की । पढ़कर अटपटा लगा , यह क्या बात हुई । फ़ेल होने पर दावत...!
उत्सुकता बढ़ गई। यह खबर तो पढ़नी चाहिए ।
आगे लिखा था , कि उस परीक्षा के परिणाम आने के आधे घंटे के भीतर  6 बच्चों ने फ़ेल होने की वजह से आत्महत्या कर ली थी।
पूरी बात शीशे की तरह साफ थी ।
आजकल जाने अंजाने बच्चों पर  पढ़ाई का इतना दबाव बढ़ गया है , परफॉर्मेंस की इतनी टेंशन तारी रहती है , कि उनकी ज़िंदगी सिर्फ पढ़ाई , ग्रेड्स और अंकों में ही उलझ कर रह जाती है । जी तोड़ मेहनत कर, कोचिंग में घंटों पढ़कर , वे दिन रात एक कर देते हैं। शिक्षा प्रणाली ऐसी है, कि खुले हाथों से अंक बंटने लगे हैं। हमें याद है , स्कूल के टोपेर्स को 74 या  75, प्रतिशत से अधिक अंक नहीं मिला करते थे । डिस्टिंशन यानि 70 प्रतिशत से ऊपर गिने चुने बच्चों को मिल पाता था । पर आजकल परिणाम देखकर तो लगता है , कि इन लोगों ने खिलवाड़ मचा रखा है । 85, 87, प्रतिशत तो औसत माने जाते हैं। टोपेर्स को 99.5 प्रतिशत अंक मिल रहे हैं...!
ऐसे में एक एक अंक के लिए बच्चे जीव दिये रहते हैं। और उसमें ज़रा सा पिछड़ जाएँ, तो सबसे बड़ी समस्या , अच्छे कॉलेज में एड्मिशन की होती है । जब प्राप्त अंकों का प्रतिशत इतना ऊँचा होता है, तो ज़ाहिर है, अच्छे कोलेजेस  का कट-ऑफ भी बहुत ऊपर जाता है ।
इस पूरी प्रक्रिया में , अभिभावकों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है । इस अंधी दौड़ में , वे बच्चों पर अनुचित दवाब डालते हैं। वजह चाहे जो भी चाहे सामाजिक प्रतित्ष्ठा हो, चाहे अपने ही सर्कल में होड हो,  दाँव पर तो बच्चा ही लगता है ।
ऐसे में क्या आपको नहीं लगता कि पहले से ही तनावग्रस्त बच्चे को हमें एक स्वस्थ माहौल, एक स्वस्थ मन:स्तिथि देने की ज़रूरत है ?
पर ऐसा होता नहीं है । बच्चों के साथ अभिभावक भी तनावग्रस्त रहते हैं, और वह बच्चे की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालता है ।
दूसरी पंक्ति पढ़ते ही, उस खबर का सच मुखर हो उठा था । बच्चे हैं, तो जहान है। एक परीक्षा  में असफल होना , किसी अंत का ध्योतक नहीं है। जीवन में और मौके आयेंगे । दोबारा कोशिश की जाएगी , और अच्छे परिणाम मिलेंगे । इसमें हतोत्साहित होने की ज़रूरत नहीं ।
कोई भी कार्य करते वक़्त , उसके पीछे की  मंशा महत्वपूर्ण होती है । अगर मंशा अच्छी है, तो आपका कृत्य  न्यायोचित है , जस्टीफिएड है । किन्तु हमारे पूर्वाग्रह हमें ऐसा करने से रोकते हैं।
इस संदर्भ में सम्यक दृष्टि से देखा जाए तो हमें उस पिता का ऐसी परिस्थिति में दावत देना  पूर्णतया  न्याओयाचित लगा ।

सरस दरबारी

मॉर्निंग वॉक – क्या फिल्मों का भविष्य दर्शक तै करते हैं


आज की सुबह बहुत ताज़ा तरीन थीं, ठंडी ठंडी हवा चल रही थी , मौसम में भी हल्की सी सिहरन थी। और मैं रोज़ की तरह अपने मॉर्निंग वॉक का लुत्फ उठा रही थी तभी बगल से दो महिलाएं कुछ वार्तालाप करती हुई गुज़रीं। दिमाग उनकी बातों में उलझ गया।  

“ पुरानी फिल्मों में कहानी ऐसी ही होती थी, हाँ संगीत बहुत बढ़िया होता था। वही घिसी पिटी हल्की फुलकी रोमांटिक् कहानियाँ...” । तभी दूसरी महिला ने बात काटते हुए कहा, की तब फिल्में लोग एंटर्टेंमेंट के लिए देखने जाते थे , रोज़मर्रा के जीवन में वही रोना धोना देखकर , कुछ समय के लिए एक ऐसी दुनिया में पहुँच जाना चाहते थे जहां, यथार्थ से दूर एक सपनों की दुनिया की सैर करें ,जहां रंग हों, खुशियाँ हों, खूबसूरती हो, प्यार मोहब्बत हो । पर आज लोग सच देखना चाहते हैं, इसलिए आज की फिल्मों में हिंसा , मार पीट, आतंक, भ्रष्टाचार, यही सब देखने को मिलता है, क्योंकि लोग यह जान गए हैं, की जीवन मेक बिलिव नहीं है, कहानियाँ जीवन से ही उठाई जाती हैं, इसलिए आज कल यतार्थवादी फिल्में बनने लगी हैं ।
वह दोनों तो बातें करती हुई निकल गईं , पर मुझे सोचने के लिए एक विषय दे गईं।
क्या वाकई फिल्में दर्शकों के चयन से बनती हैं, क्या फिल्मों का भविष्य दर्शक तै करते हैं ?
हाँ एक दौर थे जब फॉर्मूला फिल्में बनने लगीं थीं, पर जल्दी ही लोगों ने उससे ऊबना शुरू कर दिया और एक परललेल या समानान्तर फिल्मों का दौर चला। हालांकि यह फिल्में एक विशेष वर्ग ही पसंद करता था। यह कम बजेट में बनी फिल्में हुआ करती थीं, कम लागत होती थी, तो उसमें बड़े सितारे नहीं हुआ करते थे। ऐसे में आम जनता जिनपर किसी फिल्म को हिट या फ्लॉप करने का श्रेय होता था, ऐसी फिल्मों से दूरियाँ बनाने लगे।क्योंकि बतौर उनके वे इसी गरीबी, भुखमरी, और संत्रास से भागकर पैसे खर्च करके मनोरंजन खरीदते थे। नतीजा यह हुआ कि इस तरह की फिल्में या तो कुछ ही गिनती के सिनेमा घरों में मटिनी शो में दिखाई जातीं या फिर अंतर राष्ट्रीय फिल्म समारोह में शिरकत करतीं। यह फिल्में इसलिए और मुख्यधारा से हट गईं क्योंकि फिल्म फ़ाइनेंस कार्पोरेशन (FFC जो बाद में NFDC कहलाया) ने ऐसी फिल्मों के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता देनी बंद कर दी। श्याम बेनेगल, सईद मिर्ज़ा, मणि कौल, बसु चैटर्जी, सबको इसी संस्थान से वित्तीय सहायता मिली थी। लेकिन भूमंडलीकरण के बाद यह सहायता बंद कर दी गई। इस दौरान , कुछ बहुत ही अच्छी फिल्में बनीं, भुवन शोम, आविष्कार, मंथन, कलयुग, अर्धसत्य, अंकुर, मिर्च मसाला, इत्यादि फिल्में यतार्थवादी पृष्ठभूमि से जुड़ी थीं। आज भी यह फिल्में देखने का प्रलोभन हम संवार नहीं पाते।  
एक बार फिर वही दौर दिखाई देने लगा है, बस फर्क इतना है, कि अब बड़े बड़े सितारों को लेकर इस तरह की फिल्में बनाई जा रही हैं, जो समाजमें , पॉलिटिक्स में हो रहे घिनौने सच को अनावृत कर रहे हैं। यह सितारे इन फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर वह सफलता दे देते हैं , जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। कलेक्शन के नए रेकॉर्ड्स बन रहे हैं और फिल्म उद्योग में बड़े बड़े आँकड़ों का खेल हो रहा है। बड़ी बजेट की फिल्में पहले भी बनी हैं, जिनहोने अपने समय में बहुत अच्छा व्यवसाय किया। 1949 में बरसात ने 1 करोड़ 10 लाख का कारोबार किया, 1960 में मुग़ल-ए-आज़म जो अपने समय की बहुत महंगी फिल्म थी ने  5 करोड़ का बिज़नस किया। 1974 में शोले ने 65 करोड़ और 1994 में हम आपके हैं कौन ने 70 करोड़। पैसों के इस खेल का ग्राफ समय के साथ बढ़ता ही जा रहा है। गजनी ने 114 करोड़ और द थ्री ईडीओट्स ने 200 करोड़ का व्यापार किया ! पानी की तरह पैसे बहाना, एक्सोटिक लोकेशनस पर फिल्में शूट करना, आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल ने फिल्म निर्माण को नए आयाम दिये ,नए आँकड़े दिये। यह दौड़ कहाँ जाकर खत्म होगी यह कह पाना मुश्किल है। हालांकि अभी भी कुछ छोटे निर्माता ऐसे हैं जिनका मानना है कि एक फिल्म में एक साथ इतना पैसा लगाना एक बहुत बड़ा जुआ है । इससे बेहतर है कि उसी कीमत में तीन चार छोटी फिल्में बनाई जाएँ जिससे रिस्क कम हो। जो भी हो , पर यह मानना पड़ेगा कि फिल्मों के स्तर में सुधार आया है।
नायिका प्रधान फिल्मों का एक दौर था जब परिणीता’, ‘मैं चुप रहूंगी, काजल ,सुजाता, बंदिनी और मदर इंडिया जैसी फिल्में बनी थीं पर फॉर्मूला फिल्मों के चलन के बाद नायिका प्रधान फिल्मों का दौर जैसे खत्म हो गया।  नायिकाएँ अभिनेताओं के मुक़ाबले हाशिये पर रख दी गईं और केवल सजावट की वस्तु बनकर रह गईं। मधुर भंडारकर, आशुतोष गोवारीकर ने नायिका प्रधान फिल्में बनाई शुरू कीं और लोगों की इन धारणाओं को तोड़ा कि महिला प्रधान फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट नहीं होतीं, और अपनी बात को सिद्ध कर दिखाया। सेंसर बोर्ड की बढ़ती उदारता ने भी फिल्मों के कथानक और दृश्यों को काफी प्रभावित किया है। जो पहले वर्जित था, अब वैद्यता पा चुका है।
एक और विधा जिसे दर्शक बहुत सराह रहे हैं वह है एनिमेशन। पहले पैसे खर्च करके एनिमेशन फिल्में कोई देखना पसंद नहीं करता था। लेकिन हनुमान और घटोत्कछ की सफलता ने निर्माता निर्देशकों की सोच बदली है। निर्माता निर्देशक अधित्य चोपड़ा अब वाल्ट डिज़्नी स्टुडियो के साथ मिलकर भारत में एनिमेशन फिल्में बनाने लगे हैं। गोविंद निहलनी जैसे गंभीर निर्दशक भी एक ऊँट के बच्चे कि कहानी “कमलू” बना रहे हैं जो एक थ्री- डी फिल्म हैं। बच्चों के साथ अब बड़ों को भी उसमें लुत्फ आने लगा है।
पहले बाओपिक्स में लोगों की कोई रुचि नहीं थी पर मिलखा सिंह पर बनी फिल्म को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया । भारतीय महिला बॉक्सर पर जब उमंग कुमार ने मेरी कॉम बनाई, तब लोगों ने उसके बारे में जाना। दर्शकों में खिलाड़ियों, रियल लाइफ हीरोज के विषय में जानने की उत्सुकता बढ़ी और फिर एक के बाद एक बाइओपिक्स की झड़ी लग गई।
दर्शकों ने जब जिसे चाहा फ़लक पर बैठा दिया, और जब चाहा एक ही झटके में नकार दिया। अब देखना यह है कि भविष्य में किस सोच और किस विधा की फिल्मों को दर्शक तरजीह देते है, उसी तरह की फिल्में निर्माता निर्देशक बनाएँगे और उसी लकीर पर आने वाली फिल्मों का भविष्य निर्धारित होगा।

Friday, June 30, 2017

टूटना

टूटकर चाहा था तुमने 
सभी रिश्तों
उनसे जुड़ी संवेदनाओं 
और उपजते प्रश्नचिन्हों
को ताक पे रखकर ...
सबसे परे 
सिर्फ एक रिश्ता था 
हमारा अपना 
जिसमें अच्छा बुरा 
सही ग़लत
हम तै करते थे 
उसी सच को सर्वस्व मान 
पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी हमने 
आज जब तुम नहीं हो
तो तुम्हारे इस टूटकर चाहने ने 
पूरी तरह से 
तोड़ दिया है मुझे ....!!!

सरस

Friday, September 23, 2016

पैशन



एक पुरानी कहावत है , पूत के पाँव पालने में नज़र आ जाते हैं. और यह बात काफी हद तक सच है. राहुल कुछ ही महीनों का था , करवट लेकर बैठना सीख गया था. एक दिन पेट के बल सो रहा था, तभी टीवी पर उन दिनों का बड़ा ही प्रचलित गीत बज उठा. 'अम्मा देख, ओ देख तेरा मुंडा बिगड़ा जाये ........'. और  देखते ही देखते , आँखें बंद किये वह दोनों हाथ तकिये पर टिकाकर ज़ोर ज़ोर से झूमने लगा . उसके माता पिताका जो  बगल ही में बैठे टीवी देख रहे थे, हँसते हँसते बेहाल हो गए...! वॉल्यूम धीमी की, तो फिर सर रखकर सो गया, फिर बढ़ाई और वह फिर आँखें बंद किये किये झूमने लगा . उसी दिन से उन्हें यह अंदाज़ हो गया था कि उसे संगीत से ख़ास लगाव है. जैसे जैसे राहुल बड़ा होता गया उन्होने महसूस किया की वह बगैर सीखे अपने छोटे से सिंथेसाइज़र पर गीत निकाल लेता था . बहुत ताज्जुब होता था. कोई भी गीत सुनता , उँगलियाँ सिंथ पर नचाता और मिनटों में वह धुन बज उठती. फिर थोड़ा और बड़ा हुआ तो उसने गिटार सीखा और कॉलेज में अपना म्यूजिक बैंड बनाया और कई स्टेज शोज भी किये. पर कॉलेज की पढ़ाई के दौरान सब कुछ छूट गया. उनका मानना था कि इससे पेट नहीं भरता, गृहस्थी नहीं चलती। उसके लिए कोई रेसपेकटबल काम करो। गिटार अकेलेपन का साथी और बैंड एक सपना बनकर रह गया।   
यह सिर्फ एक राहुल की ही कहानी नहीं है. हम लोगों में से कितने लोग अपने सपने वाकई पूरे कर पाते हैं. बड़े होते होते एहसास होता है, की हम लोगों के बचपन के हुनर धीरे धीरे या तो ख़त्म हो जाते हैं , या फिर प्राथमिकताओं की भेंट चढ़ जाते हैं.  बच्चे जैसे जैसे बड़े होते हैं, हम  उन्हें  ओब्सेर्व करते हैं, उनकी  रुचियों को समझने की कोशिश करते हैं. कभी कभी उन्हें बढ़ावा भी देते हैं. पर जब ज़रा भी महसूस होता है कि उसका शौक , पढ़ाई के आड़े आ रहा है तो हम तुरंत उसपर लगाम कसकर , पढ़ाई और कैरियर का हवाला देकर , उसके शौकको दर किनार कर देते हैं . और अंतत: वह उस शौक को परस्यू नहीं कर पाता
लेकिन वह चिंगारी कहीं भीतर दबी रह जाती है और वह खालीपन जीवन में बना ही रह जाता है । वह बेमन से नौकरी करता है। हर दिन एक बोझ सा और शाम चलो एक और दिन कटा के एहसास के साथ बीतते जाते हैं। बनना चाहता था टीचर, पर बन गया इंजीनियर, या बनना चाहता था कुछ , बन गया कुछ। और अपनी शिक्षा के बोझ तले दबा वह मजबूरी में ऑफिस जाता है, मन नहीं लगता फिर भी जुटा रहता है, क्योंकि वह जकड़ा हुआ है गृहस्थी के जंजालों में, और अपनी बँधी बँधाई आमदनी के साथ कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। लिहाजा ढोता रहता है एक अनचाहा बोझ। क्या इस तरह से वह अपने प्रॉफ़ेशन को अपना 100 प्रतिशत दे पाएगा। पर ज़रा सोचिए अगर उसने अपने मनका प्रॉफ़ेशन चुना होता, कुछ  ऐसा जिसमें उसे मज़ा आता है, जो सोते जागते, उठते बैठते , उसके दिमाग पर चौबीसों घंटों हावी रहता है, तो वह कितना बेहतर  काम कर पाता। कितना खुश रहता। हो सकता है , उसके शौक के हिसाब से उसकी आमदनी मौजूदा आमद से घाट बढ़ भी सकती थी, पर वह खुश रहता।
अक्सर  सुनने में आता है , की अमुक ने अपना कैरियर छोडकर , एक बिलकुल ही अलग व्यवसाय अपना लिया। कॉर्पोरेट दुनिया में एक ऊँची पोस्ट पर होने के बावजूद, नौकरी छोड़ एक रैस्टौरेंट खोल लिया और अब बहुत खुश है । यह एक बहुत्त बड़ा निर्णय होता है, अपने सुरक्षा कवच से निकालकर, अपना कम्फर्ट जोने छोड़कर एक सर्वथा भिन्न क्षेत्र में कदम रखना , महज़ इसलिए कि वह उसका पैशन है, बहुत हिम्मत, दृढ़ता और लगन का परिचायक है. पर हिम्मत भी वही करता है जो अपनी धुन का पक्का हैं। और आखिरकार जब वह अपने शौक को कमाई का जरिया बना लेता है तो सोचता है मैंने यह पहले क्यों नहीं किया। जीवन के इतने साल बर्बाद कर दिये। पर चलो देर आए दुरुस्त आए।
यह माद्दा आजकल की पीढ़ी में काफी हद तक दिखाई देता है. अच्छी खासी लगी लगाई नौकरी छोड़कर, आर्थिक असुरक्षा की परवाह किए बगैर अपने आपको पूरी तरह से तयार करके, सही गलत, भला बुरा, नाफा नुकसान, हर चीज़ को समझकर वे अंजाने रास्तों पर चल देते हैं। वे रास्ते जो उन्हे उनके पैशन तक आखिरकार पहुँचा ही देते हैं। क्या ही अच्छा होता है अगर हम इस बात को पहले ही समझ लेते, बच्चों की रुचि को पहचान लेते और उन्हें बढ़ावा देते।   
इस दुविधा की बहुत बड़ी वजह है, माता पिता का अल्प ज्ञान। एक  ज़माना था जब गिनती के कुछ ही व्यवसाय हुआ करते थे और अभिभावकों को इससे इतर कोई भी व्यवसाय चुनना असुरक्षित और प्रतिष्ठाहीन  लगता था। आज भी यह समस्या बनी हुई है। जबकि सच्चाई तो यह है, कि अब इतने नए विकल्प मौजूद हैं, जिनके विषय में आज की पीढ़ी जागरूक है जिसे वे अपनी अपनी रुचि के हिसाब से अपना सकते हैं, अच्छा कमा सकते हैं और खुश रह सकते हैं। फिर क्यों न संवेदनशील और जिम्मेदार अभिभावक होने के नाते हम अपने बच्चों को सही दिशा चुनने में उनकी मदत करें,न कि उन्हें जीवनभर के लिए घुटनभरी ज़िंदगी के अधीन कर दें।  
ज़रा सोचकर देखिये.....    


Thursday, March 26, 2015

इष्टाबाई




मुंबई की बारिश .....जब बरसनी शुरू होती है तो महीने महीने भर सूरज के दर्शन नहीं हो पाते.....नदी नाले परनाले सब पूरे उफान पे होते हैं ... लेकिन जीवन फिर भी नहीं रुकता ....घुटने घुटने पानी में भी बच्चे स्कूल जाते हैं और रेलवे ट्रैक्स में पानी भरने के बावजूद लोग ऑफिस जाना नहीं छोड़ते ........
ऐसी ही भयानक बारिश की वह रात थी.....बहोत देर हो चुकी थी ...पर दशरथ का कोई अता पता नहीं था. वह शाम से ही घर से गायब था. इष्टा घर पर परेशान उसका इंतज़ार कर रही थी ......रात गहराती जा रही थी और  बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी …. उसका सब्र छूटता जा रहा था ....जब अंदेशे हावी होने लगे और अनर्थों की झड़ी लगने लगी तो उससे रहा नहीं गया और वह एक छिदहा छाता लिए उस तूफानी रात में उसे खोजने निकल पड़ी.
मोहल्ले की हर वह हौली..जहाँसे वह दशरथ को अनेकों बार उठाकर लायी थी ....सभी यार दोस्तों के ठिकाने जो उसके पीने के साथी थे ......हर वह जगह जहाँ उसके होने का ज़रा भी अंदेशा हो सकता था , उसने छान मारा , पर दशरथ का कहीं पता न था .....वह रोती हुई ..लगभग चीखती हुई ...उस बारिश में उसका नाम ले लेकर पुकार रही थी ...पर दशरथ नदारद ..... वह रोती रोती परेशान बेहाल ..... उसे ढूंढ ही रही थी जब घर के पास वाले एक गटर में वह उसे पड़ा मिला ....जगह जगह कटा फटा .... उसे इस हाल में देख उसका कलेजा मुँह को गया ...
कहीं...!आशंका ने फन उठाया.....
नहीं नहीं. उसने फन को कुचल दिया.
उसे पहले हौले से हिलाया डुलाया ...वह नहीं बोला. फन में फिर हरकत हुई. उसने उसपर फिर वार किया.. दशरथ उठ रे”, वह उसे झकझोरते हुए चीखी ......तभी कुछ हलचल हुई और वह नशे में बड़बड़ाया.
इष्टा की जान में जान आयी. “रे देवा दया कर
जब वह आश्वस्त हो गयी की वह ज़िंदा है, तब भीतर दबा सैलाब गालियाँ बनकर दशरथ पर बरसा.
अरे मेल्या कायको मेरा जीवन सत्यानास करता है रे ......"इद्दर दारू पीकर गटर में पड़ा है और मैं अक्खा कालोनी में ढूंढ़ती तेरे को ......मेरे को एक इच बार में मार डाल रे , नइ तो तूच मर जा ......मेरे जीव के पीछे कायको पड़ा है ? "
और नशे में धुत दशरथ सुनता रहा. उसके प्रलाप का उसपर कोई असर नहीं हो रह था. भड़ास कम हुई तो उसे सहारा दे, भीगती हुई, उसे छाते के नीचे बारिश से बचाती हुई, लड़खड़ाती, संभालती किसी तरह घर पहुंची .

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 मूसलाधार बारिश हो रही थी . इंद्र का प्रकोप हावी था. भरी दोपहरी में भी  रात का अंदेशा हो रहा था.   देखते ही देखते घुटनों तक पानी भर गया . तभी किसी को गेट से आते हुए देखा. धूमिल आकृतियों से अंदाज़ा लगाया कि तेज़ हवाओं से अस्त व्यस्त छाते को जैसे तैसे संभालती हुई कोई औरत, बारिश और हवा के थपेड़ों से, अपने आप को बचाती हुई, बगल में कोई १४, १५ साल के बीमार लड़के को भींचे हुए इसी और आ रही थी.
दरवाज़े की घंटी बजी.
“अरे इष्टा तुम ...और यह कौन है ....?"
मेरा मरद है दीदी
कौन दशरथ ..उसे क्या हुआ”
"अरे दीदी मई अब क्या बोलूँ....दारु पीके नाली में पड़ा था मेल्या ....कब्बी से ढूँढती थी उसकू. अब्बी डॉक्टर के पास जाती ...लई  चोट लगा है उसकू." दीदी मई आज दोफेर को काम पे नै आएगी...बस इतना इच बताने को आयी थी "
दशरथ की हालत और उससे अधिक इष्टा की चिंता देख , कुछ और कहना उचित नहीं समझा


एक दिन काम पर आई तो देखा चेहरा सूजा हुआ है और एक आँख नीली हुई पड़ी थी.पूछने पर पहले तो बात को टालती रही , लेकिन जब डाँटा, तो रोती हुई बोली- "दीदी दशरथ का लीवर ख़राब हो गयेला है ...डॉक्टर मेरे को बोला , अउर दारु पियेगा तो मर जायेगा . मई उसको मना की दारु पीने को .....वह दारु का वास्ते पईसा मांगता था ..मई नई दी बोलके मेरेको बहोत मारा स्साला...."..कहकर फिर रोने लगी ..
मैंने कहा , "वह बित्ते भरका आदमी तुमको मारता कैसे है ..तुम इतनी हट्टी कट्टी..लम्बाई में उससे दुगुनी..क्यों मार खाती हो  ?"
इष्टा पहले तो चुपचाप मेरी बात सुनती रही फिर धीरे से बोली, "क्या करूँ दीदी ...वह देखने में छोटा है पर लै( बहोत) मारता है मेरे को ....दारु पी पीकर वाट लगाकर रखा है अक्खा शरीर का, मई मारेगी तो मर इच  जायेगा वह . रोज दारु पीकर आता है और छोटा छोटा बात पे खाली फ़ोकट झगड़ा करता है ...मई कुछ बोलती तो बहुत मारता है ...काम पे बी जाने को नई देता ...बोलता है बाहर जाके उल्टा सीधा काम करती "...कहते कहते फूटकर फूटकर इष्टा रोने लगी..........उसकी बेबसी चुभ गयी भीतर तक ...इष्टा जैसी न जाने कितनी हमारे मोहल्लों में, झोपड़ पट्टी में, रहती हैं दिन भर काम कर कर हलकान भी रहती है और, ऐसे निखट्टू, नालायक पतियीं की लात घूंसे और बातें  भी बर्दाश्त करती हैं.
रोकर मन कुछ हल्का हुआ तो बोली, " दीदी काम पे नई जायगी तो घर कईसे चलाएगी ...दो छोटा छोटा बच्चा है , लड़की पण सायानी हो गयी ...लगन करने का है उसका ...कईसे करूँ..आपीच  बोलो ."
इष्टा का यह हाल देख खून खौल कर रह गया .....हिम्मत कैसे होती है इन लोगों की .....खुद तो कुछ करते नहीं ...धरती पर बोझ .....और अपनी पत्नी पर इतना गन्दा लांछन लगाते हुए ज़बान नहीं काँपती? ......इतनी घटिया बात सोच भी कैसे सकते हैं? वह औरत तुम्हारा घर चला रही है , तुम्हारे बच्चे पाल रही है  ......ऐसे लोगों को तो ......और फिर अचानक इष्टा का चेहरा आँखों के सामने गया ..उसके चेहरा जैसे इल्तिजा कर रहा था ...दीदी जाने दो .
लेकिन गुस्सा बहोत रहा था , दशरथ पर, और उससे ज़्यादा इष्टा पर !
इष्टा के जाने के बाद उसकी बातें बहोत देर तक दिमाग उलझाती रहीं …… रह रहकर बस एक ही ख़याल आता .... यह कैसी कौम है ...सारा काम औरत करे, घर वह चलाये, बच्चे वह संभाले , राशन पानी का इंतजाम वह करे ....पति की ज़रूरतें पूरी करे ....और दिन भर बाहर मेहनत करने के बाद पति से मार भी खाए ...और उसपर तुर्रा यह कि तुम उलटे सीधे कामोंसे पैसे कमाती हो...छी :....कितनी नीच सोच है इस कौम की ......पिस्सू कहीं के ....!!!!..बस कमाऊ बीवी पर हुकुम चलाने, मारने पीटने में ही अपनी मर्दानगी दिखाना चाहते हैं . अगर मर्द होने का इतना ही गुमान है तो क्यों नहीं अपनी ज़िम्मेदारी उठाते. रखें बीवी को घर पर, कमाएँ चार पैसे और बीवी के हाथ पर धर दें . लेकिन नहीं,  उनकी मर्दानगी केवल अपनी बीवी को दबाकर रखने में है. पैरासाइट हैं यह पूरी कौम .... पिस्सू कहीं के ...!!!
पिस्सू ...जो उसीका खून पीते हैं ...जिसके शरीर पर पलते हैं. ..दशरथ भी उसी कौम का था.

एक बार बातों ही बातों मैंने पूछा था उससे की "क्या आराम हैं तुझे इससे ...तू ही कमाकर उसे खिलाती हैं , घर काम करती हैं , चार पैसे कमाती हैं, जो वह मार पीटकर तुझसे छीन लेता हैं....कौनसा आराम हैं तुझे उससे . उसपर मरहम पट्टी का खर्चा अलग."
इष्टा बोली , "दीदी जैसा बी हैं ...मरद तो हैं . एकली औरत नई रह सकती इस दुनिया में . बहुत गन्दा लोग हैं दीदी . एकली ..उपरसे गरीब . तुम्हीच सोचो दीदी झोपड़पट्टी में रहती मै. मरद हैं बोलके , यह टिकुली, यह मंगलसूत्र दीखता लोगों को . एक मरदवाली हूँ बोलके कोई जल्दी नई बोलता मेरे को  पर एकली हो गयी तो गिद्ध का माफक खा जायेंगे मेरेकू."
इष्टा के जाने के बाद काफी देर तक उसका यह तर्क, दिमाग में उथल पुथल मचाता रहा . अपने लहज़े में एक बहुत कड़वा सच कह गयी थी वह ...जो  विद्रूप था घिनौना था, असहनीय था और जिसके आगे हम सब बेबस हैं . यह सिर्फ इष्टा का सच नहीं था ....यह उस समाज का सच था, उस की मानसिकता का सच था, जिसमें हम रहते हैं.
हम अपने आपको प्रबुद्ध वर्ग की श्रेणी में रखते हैं...क्या हमारी भी कुछ ऐसी हो सोच नहीं है ?
हाँ शायद हमारे शब्द उसकी तरह क्रूड हों  लेकिन सच्चाई तो उतनी ही क्रूड है . यहाँ एक डाइवोर्सी या विधवा का ठप्पा किसी औरत पर लग जाये तो लोग उसे 'फ्री फॉर आल' समझने लगते हैं . फिर तपका चाहे जो भी हो ..मानसिकता तो वही रहेगी . पति का नाम एक लक्ष्मण रेखा है ...जिसे  शरीफ लांघने से डरते हैं ...विकृत मानसिकता के आगे तो कोई भी दीवार नहीं टिक सकती ...फिर      एक लकीर की क्या औकात .नियम तो सदा शरीफों के लिए ही बने हैं...दानवों के लिए नहीं  ...और ऐसे में हर कदम फूँक- फूँक कर रखना होता हैं , ख़ास तौर पर हम औरतों को. और इष्टा वह तो सुन्दर भी थी , साँवली, सलोनी, जब मुस्कुराती तो सफ़ेद दांतों की पंक्ति खिल जाती .उसपर उसका स्वाभाव .....इस सबके बावजूद भी हमेशा खुश दिखाई देती ...उसे देख मायूस चेहरे के भी कोंटूर्स बदल जाते. उसे अपने आपको सुरक्षित रखना था.
ऐसे में पति के नाम का यह कवच  हर औरत चाहती है . इष्टा भी चाहती  थी.
फिर कहाँ गलत थी इष्टा. वह समाज के जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही थी , उनके लिए तो तो दो जून रोटी मुहैया करने की चिंता ही इतनी बड़ी थी की सारी जद्दो जेहद वहीँ तक आकर सिमट जाया करती थी . उन्हें भला जीवन की बारीकियों से क्या वास्ता.
उस अनपढ़ कामवाली बाई ने जीवन की एक बहोत बड़ी सच्चाई मेरे सामन उघाड़ कर रख दी थी. वह सच जिसे हम झूठे आश्वासनों में भुलाये रहते हैं. कितना आसान होता हैं दूसरों को नसीहत देना लेकिन हम सब भी तो काफी हद तक इसी सच्चाई को ढो रहे हैं.
सरस
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