Wednesday, April 3, 2019

मेरी बेटी अब माँ बन गयी है


मेरी बेटी अब माँ बन गयी है


मेरी बेटी अब माँ बन गयी है
बचपन में
कई बार पोछें हैं मेरे आँसू
फ्रॉक के घेर से
ज़ख्मों पर फूँक मार
उड़ाकर दर्द को
हथेलियाँ नचा
काफूर कर दी है सारी पीड़ा...
अनेकों बार 
छोटीसी गोद में सिर रख
दुलारा है मेरी थकन को
और भर दी है स्फूर्ति...
अब वह नन्ही
बड़ी हो गई है 
नन्ही को सीने से लगा
हरती है उसकी पीड़ा
आँचल में छिपा 
दुलारती है उसे
भरती है जीवन की ऊर्जा।
ताज्जुब करती है
माँ,
माँ बनना कितना सुखद होता है
एक विचित्र सा एहसास
मेरे खून, माँसपेशियों से बनी
मेरा अंश..!
मेरा अपना सृजन..!
अद्वितीय है 
यह अनुभव माँ
निहारती हुए
हर हरकत पर भरमाते हुए
छिपा लेती है उसे दुनिया से
बुरी नज़र से दूर।
मेरी नन्ही अब माँ बन गयी है।

सरस दरबारी

Monday, April 1, 2019

लहरें ......


लहरों को देखकर अक्सर मन में कई विचार कौंधते हैं .....

समंदर के किनारे बैठे
कभी लहरों को गौर से देखा है
एक दूसरे से होड़ लगाते हुए ..
हर लहर तेज़ी से बढ़कर ...
कोई  छोर  छूने  की पुरजोर  कोशिश  करती
फेनिल सपनों के निशाँ छोड़ -
लौट आती -
और आती हुई लहर दूने जोश से
उसे काटती हुई आगे बढ़ जाती
लेकिन यथा शक्ति प्रयत्न के बाद
वह भी थककर लौट आती
.......बिलकुल हमारी बहस की तरह !!!!!


             (२)

कभी शोर सुना है लहरों का ....
दो छोटी छोटी लहरें -
हाथों में हाथ डाले -
ज्यूँ ही सागर से दूर जाने की
कोशिश करती हैं-
गरजती हुई बड़ी लहरें
उनका पीछा करती हुई
दौड़ी आती हैं -
और उन्हें नेस्तनाबूत कर
लौट जाती हैं -
बस किनारे पर रह जाते हैं -
सपने-
ख्वाईशें -
और जिद्द-
साथ रहने की ....
फेन की शक्ल में ...!!!!!

           (३ )

लहरों को मान मुनव्वल करते देखा है कभी !
एक लहर जैसे ही रूठकर आगे बढ़ती है
वैसे ही दूसरी लहर
दौड़ी दौड़ी
उसे मनाने पहुँच जाती है
फिर दोनों ही मुस्कुराकर -
अपनी फेनिल ख़ुशी
किनारे पर छोड़ते हुए
साथ लौट आते हैं
दो प्रेमियों की तरह....!!!!!

                      ( ४ )

कभी कभी लहरें -
अल्हड़ युवतियों सी
एक स्वछन्द वातावरण में
विचरने निकल पड़तीं हैं ---
घर से दूर -
एल अनजान छोर पर !
तभी बड़ी लहरें
माता पिता की चिंताएँ -
पुकारती हुई
बढ़ती आती हैं ...
देखना बच्चों संभलकर
यह दुनिया बहुत बुरी है
कहीं खो न जाना
अपना ख़याल रखना -
लगभग चीखती हुई सी
वह बड़ी लहर उनके पीछे पीछे भागती है ...
लेकिन तब तक -
किनारे की रेत -
सोख चुकी होती है उन्हें -
बस रह जाते हैं कुछ फेनिल अवशेष
यादें बन .....
आँसू बन ......
तथाकथित कलंक बन ....!!!!! 

सरस दरबारी

लघुकथा - ब्रह्मराक्षस






पिछले कुछ दिनों से सजीव बहुत चिड़चिड़ा हो गया था । सोमा जब भी लैपटाप लेकर बैठती , उसका चिड़चिड़ा पन और बढ़ जाता। सोमा छेड़ छेड़कर बात करने की कोशिश करती पर सजीव का पारा और चढ़ जाता । 
"क्या बात है सजीव, क्यों इतने शॉर्ट टेम्पेर्ड हो गए हो । ज़रा ज़रा सी बात पर उलझ जाते हो। आखिर किस बात से नाराज़ हो बताओ भी तो ।" 
"किसी बात से नहीं। तुम्हारे पास तो मेरे लिए टाइम ही नहीं रह गया। जब देखो लैपटाप लेकर बैठी रहती हो।”
"कहाँ सजीव ? जितनी देर घर पर रहते हो तुम्हारे ही आगे पीछे घूमती रहती हूँ। जब बिज़ि रहते हो, तभी अपना काम लेकर बैठती हूँ।" 
"कौन सा काम , म्यूचुअल हौसला अफजाई । यह भी कोई काम हुआ। न जाने कैसे कैसे लोग तुम्हारी पोस्ट्स पर कमेंट करते रहते हैं, और तुम स्माइलीस भेजती रहती हो ।"
"यह तुम्हें क्या हो गया है सजीव , यह मेरे मित्र हैं। और मैंने तो कभी ऐतराज नहीं किया जब तुम घंटों फ़ेसबुक पर चैट करते रहते हो । मैं तो सिर्फ उनके कमेंट्स के ऐवज में उनका शुक्रिया अदा करती हूँ । तुम इतने पढे लिखे होकर ऐसी बात कर रहे हो ।" 
"बस यही तो । मेरा पढ़ा लिखा होना ही मेरे लिए अभिशाप बन गया है । अनपढ़ होता तो हाथ उठाकर अपनी बात मनवा लेता। पर पढ़ा लिखा होना ही मेरी बेड़ियाँ बन गया है ।" 
सोमा अवाक थी। 
सजीव दरवाजा भाड़ से बंद कर घर से बाहर निकल गया। 
अहम का ब्रह्मराक्षस सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था।


सरस दरबारी

Friday, May 25, 2018

मॉर्निंग वॉक – हमारे पूर्वाग्रह




अभी कुछ ही दिन पहले अखबार पढ़ते हुए , एक अजीब सी खबर पर नज़र पड़ी । एक पिता ने अपने बेटे के दसवीं फ़ेल होने पर दावत की । पढ़कर अटपटा लगा , यह क्या बात हुई । फ़ेल होने पर दावत...!
उत्सुकता बढ़ गई। यह खबर तो पढ़नी चाहिए ।
आगे लिखा था , कि उस परीक्षा के परिणाम आने के आधे घंटे के भीतर  6 बच्चों ने फ़ेल होने की वजह से आत्महत्या कर ली थी।
पूरी बात शीशे की तरह साफ थी ।
आजकल जाने अंजाने बच्चों पर  पढ़ाई का इतना दबाव बढ़ गया है , परफॉर्मेंस की इतनी टेंशन तारी रहती है , कि उनकी ज़िंदगी सिर्फ पढ़ाई , ग्रेड्स और अंकों में ही उलझ कर रह जाती है । जी तोड़ मेहनत कर, कोचिंग में घंटों पढ़कर , वे दिन रात एक कर देते हैं। शिक्षा प्रणाली ऐसी है, कि खुले हाथों से अंक बंटने लगे हैं। हमें याद है , स्कूल के टोपेर्स को 74 या  75, प्रतिशत से अधिक अंक नहीं मिला करते थे । डिस्टिंशन यानि 70 प्रतिशत से ऊपर गिने चुने बच्चों को मिल पाता था । पर आजकल परिणाम देखकर तो लगता है , कि इन लोगों ने खिलवाड़ मचा रखा है । 85, 87, प्रतिशत तो औसत माने जाते हैं। टोपेर्स को 99.5 प्रतिशत अंक मिल रहे हैं...!
ऐसे में एक एक अंक के लिए बच्चे जीव दिये रहते हैं। और उसमें ज़रा सा पिछड़ जाएँ, तो सबसे बड़ी समस्या , अच्छे कॉलेज में एड्मिशन की होती है । जब प्राप्त अंकों का प्रतिशत इतना ऊँचा होता है, तो ज़ाहिर है, अच्छे कोलेजेस  का कट-ऑफ भी बहुत ऊपर जाता है ।
इस पूरी प्रक्रिया में , अभिभावकों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है । इस अंधी दौड़ में , वे बच्चों पर अनुचित दवाब डालते हैं। वजह चाहे जो भी चाहे सामाजिक प्रतित्ष्ठा हो, चाहे अपने ही सर्कल में होड हो,  दाँव पर तो बच्चा ही लगता है ।
ऐसे में क्या आपको नहीं लगता कि पहले से ही तनावग्रस्त बच्चे को हमें एक स्वस्थ माहौल, एक स्वस्थ मन:स्तिथि देने की ज़रूरत है ?
पर ऐसा होता नहीं है । बच्चों के साथ अभिभावक भी तनावग्रस्त रहते हैं, और वह बच्चे की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालता है ।
दूसरी पंक्ति पढ़ते ही, उस खबर का सच मुखर हो उठा था । बच्चे हैं, तो जहान है। एक परीक्षा  में असफल होना , किसी अंत का ध्योतक नहीं है। जीवन में और मौके आयेंगे । दोबारा कोशिश की जाएगी , और अच्छे परिणाम मिलेंगे । इसमें हतोत्साहित होने की ज़रूरत नहीं ।
कोई भी कार्य करते वक़्त , उसके पीछे की  मंशा महत्वपूर्ण होती है । अगर मंशा अच्छी है, तो आपका कृत्य  न्यायोचित है , जस्टीफिएड है । किन्तु हमारे पूर्वाग्रह हमें ऐसा करने से रोकते हैं।
इस संदर्भ में सम्यक दृष्टि से देखा जाए तो हमें उस पिता का ऐसी परिस्थिति में दावत देना  पूर्णतया  न्याओयाचित लगा ।

सरस दरबारी

मॉर्निंग वॉक – क्या फिल्मों का भविष्य दर्शक तै करते हैं


आज की सुबह बहुत ताज़ा तरीन थीं, ठंडी ठंडी हवा चल रही थी , मौसम में भी हल्की सी सिहरन थी। और मैं रोज़ की तरह अपने मॉर्निंग वॉक का लुत्फ उठा रही थी तभी बगल से दो महिलाएं कुछ वार्तालाप करती हुई गुज़रीं। दिमाग उनकी बातों में उलझ गया।  

“ पुरानी फिल्मों में कहानी ऐसी ही होती थी, हाँ संगीत बहुत बढ़िया होता था। वही घिसी पिटी हल्की फुलकी रोमांटिक् कहानियाँ...” । तभी दूसरी महिला ने बात काटते हुए कहा, की तब फिल्में लोग एंटर्टेंमेंट के लिए देखने जाते थे , रोज़मर्रा के जीवन में वही रोना धोना देखकर , कुछ समय के लिए एक ऐसी दुनिया में पहुँच जाना चाहते थे जहां, यथार्थ से दूर एक सपनों की दुनिया की सैर करें ,जहां रंग हों, खुशियाँ हों, खूबसूरती हो, प्यार मोहब्बत हो । पर आज लोग सच देखना चाहते हैं, इसलिए आज की फिल्मों में हिंसा , मार पीट, आतंक, भ्रष्टाचार, यही सब देखने को मिलता है, क्योंकि लोग यह जान गए हैं, की जीवन मेक बिलिव नहीं है, कहानियाँ जीवन से ही उठाई जाती हैं, इसलिए आज कल यतार्थवादी फिल्में बनने लगी हैं ।
वह दोनों तो बातें करती हुई निकल गईं , पर मुझे सोचने के लिए एक विषय दे गईं।
क्या वाकई फिल्में दर्शकों के चयन से बनती हैं, क्या फिल्मों का भविष्य दर्शक तै करते हैं ?
हाँ एक दौर थे जब फॉर्मूला फिल्में बनने लगीं थीं, पर जल्दी ही लोगों ने उससे ऊबना शुरू कर दिया और एक परललेल या समानान्तर फिल्मों का दौर चला। हालांकि यह फिल्में एक विशेष वर्ग ही पसंद करता था। यह कम बजेट में बनी फिल्में हुआ करती थीं, कम लागत होती थी, तो उसमें बड़े सितारे नहीं हुआ करते थे। ऐसे में आम जनता जिनपर किसी फिल्म को हिट या फ्लॉप करने का श्रेय होता था, ऐसी फिल्मों से दूरियाँ बनाने लगे।क्योंकि बतौर उनके वे इसी गरीबी, भुखमरी, और संत्रास से भागकर पैसे खर्च करके मनोरंजन खरीदते थे। नतीजा यह हुआ कि इस तरह की फिल्में या तो कुछ ही गिनती के सिनेमा घरों में मटिनी शो में दिखाई जातीं या फिर अंतर राष्ट्रीय फिल्म समारोह में शिरकत करतीं। यह फिल्में इसलिए और मुख्यधारा से हट गईं क्योंकि फिल्म फ़ाइनेंस कार्पोरेशन (FFC जो बाद में NFDC कहलाया) ने ऐसी फिल्मों के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता देनी बंद कर दी। श्याम बेनेगल, सईद मिर्ज़ा, मणि कौल, बसु चैटर्जी, सबको इसी संस्थान से वित्तीय सहायता मिली थी। लेकिन भूमंडलीकरण के बाद यह सहायता बंद कर दी गई। इस दौरान , कुछ बहुत ही अच्छी फिल्में बनीं, भुवन शोम, आविष्कार, मंथन, कलयुग, अर्धसत्य, अंकुर, मिर्च मसाला, इत्यादि फिल्में यतार्थवादी पृष्ठभूमि से जुड़ी थीं। आज भी यह फिल्में देखने का प्रलोभन हम संवार नहीं पाते।  
एक बार फिर वही दौर दिखाई देने लगा है, बस फर्क इतना है, कि अब बड़े बड़े सितारों को लेकर इस तरह की फिल्में बनाई जा रही हैं, जो समाजमें , पॉलिटिक्स में हो रहे घिनौने सच को अनावृत कर रहे हैं। यह सितारे इन फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर वह सफलता दे देते हैं , जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। कलेक्शन के नए रेकॉर्ड्स बन रहे हैं और फिल्म उद्योग में बड़े बड़े आँकड़ों का खेल हो रहा है। बड़ी बजेट की फिल्में पहले भी बनी हैं, जिनहोने अपने समय में बहुत अच्छा व्यवसाय किया। 1949 में बरसात ने 1 करोड़ 10 लाख का कारोबार किया, 1960 में मुग़ल-ए-आज़म जो अपने समय की बहुत महंगी फिल्म थी ने  5 करोड़ का बिज़नस किया। 1974 में शोले ने 65 करोड़ और 1994 में हम आपके हैं कौन ने 70 करोड़। पैसों के इस खेल का ग्राफ समय के साथ बढ़ता ही जा रहा है। गजनी ने 114 करोड़ और द थ्री ईडीओट्स ने 200 करोड़ का व्यापार किया ! पानी की तरह पैसे बहाना, एक्सोटिक लोकेशनस पर फिल्में शूट करना, आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल ने फिल्म निर्माण को नए आयाम दिये ,नए आँकड़े दिये। यह दौड़ कहाँ जाकर खत्म होगी यह कह पाना मुश्किल है। हालांकि अभी भी कुछ छोटे निर्माता ऐसे हैं जिनका मानना है कि एक फिल्म में एक साथ इतना पैसा लगाना एक बहुत बड़ा जुआ है । इससे बेहतर है कि उसी कीमत में तीन चार छोटी फिल्में बनाई जाएँ जिससे रिस्क कम हो। जो भी हो , पर यह मानना पड़ेगा कि फिल्मों के स्तर में सुधार आया है।
नायिका प्रधान फिल्मों का एक दौर था जब परिणीता’, ‘मैं चुप रहूंगी, काजल ,सुजाता, बंदिनी और मदर इंडिया जैसी फिल्में बनी थीं पर फॉर्मूला फिल्मों के चलन के बाद नायिका प्रधान फिल्मों का दौर जैसे खत्म हो गया।  नायिकाएँ अभिनेताओं के मुक़ाबले हाशिये पर रख दी गईं और केवल सजावट की वस्तु बनकर रह गईं। मधुर भंडारकर, आशुतोष गोवारीकर ने नायिका प्रधान फिल्में बनाई शुरू कीं और लोगों की इन धारणाओं को तोड़ा कि महिला प्रधान फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट नहीं होतीं, और अपनी बात को सिद्ध कर दिखाया। सेंसर बोर्ड की बढ़ती उदारता ने भी फिल्मों के कथानक और दृश्यों को काफी प्रभावित किया है। जो पहले वर्जित था, अब वैद्यता पा चुका है।
एक और विधा जिसे दर्शक बहुत सराह रहे हैं वह है एनिमेशन। पहले पैसे खर्च करके एनिमेशन फिल्में कोई देखना पसंद नहीं करता था। लेकिन हनुमान और घटोत्कछ की सफलता ने निर्माता निर्देशकों की सोच बदली है। निर्माता निर्देशक अधित्य चोपड़ा अब वाल्ट डिज़्नी स्टुडियो के साथ मिलकर भारत में एनिमेशन फिल्में बनाने लगे हैं। गोविंद निहलनी जैसे गंभीर निर्दशक भी एक ऊँट के बच्चे कि कहानी “कमलू” बना रहे हैं जो एक थ्री- डी फिल्म हैं। बच्चों के साथ अब बड़ों को भी उसमें लुत्फ आने लगा है।
पहले बाओपिक्स में लोगों की कोई रुचि नहीं थी पर मिलखा सिंह पर बनी फिल्म को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया । भारतीय महिला बॉक्सर पर जब उमंग कुमार ने मेरी कॉम बनाई, तब लोगों ने उसके बारे में जाना। दर्शकों में खिलाड़ियों, रियल लाइफ हीरोज के विषय में जानने की उत्सुकता बढ़ी और फिर एक के बाद एक बाइओपिक्स की झड़ी लग गई।
दर्शकों ने जब जिसे चाहा फ़लक पर बैठा दिया, और जब चाहा एक ही झटके में नकार दिया। अब देखना यह है कि भविष्य में किस सोच और किस विधा की फिल्मों को दर्शक तरजीह देते है, उसी तरह की फिल्में निर्माता निर्देशक बनाएँगे और उसी लकीर पर आने वाली फिल्मों का भविष्य निर्धारित होगा।

Friday, June 30, 2017

टूटना

टूटकर चाहा था तुमने 
सभी रिश्तों
उनसे जुड़ी संवेदनाओं 
और उपजते प्रश्नचिन्हों
को ताक पे रखकर ...
सबसे परे 
सिर्फ एक रिश्ता था 
हमारा अपना 
जिसमें अच्छा बुरा 
सही ग़लत
हम तै करते थे 
उसी सच को सर्वस्व मान 
पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी हमने 
आज जब तुम नहीं हो
तो तुम्हारे इस टूटकर चाहने ने 
पूरी तरह से 
तोड़ दिया है मुझे ....!!!

सरस

Friday, September 23, 2016

पैशन



एक पुरानी कहावत है , पूत के पाँव पालने में नज़र आ जाते हैं. और यह बात काफी हद तक सच है. राहुल कुछ ही महीनों का था , करवट लेकर बैठना सीख गया था. एक दिन पेट के बल सो रहा था, तभी टीवी पर उन दिनों का बड़ा ही प्रचलित गीत बज उठा. 'अम्मा देख, ओ देख तेरा मुंडा बिगड़ा जाये ........'. और  देखते ही देखते , आँखें बंद किये वह दोनों हाथ तकिये पर टिकाकर ज़ोर ज़ोर से झूमने लगा . उसके माता पिताका जो  बगल ही में बैठे टीवी देख रहे थे, हँसते हँसते बेहाल हो गए...! वॉल्यूम धीमी की, तो फिर सर रखकर सो गया, फिर बढ़ाई और वह फिर आँखें बंद किये किये झूमने लगा . उसी दिन से उन्हें यह अंदाज़ हो गया था कि उसे संगीत से ख़ास लगाव है. जैसे जैसे राहुल बड़ा होता गया उन्होने महसूस किया की वह बगैर सीखे अपने छोटे से सिंथेसाइज़र पर गीत निकाल लेता था . बहुत ताज्जुब होता था. कोई भी गीत सुनता , उँगलियाँ सिंथ पर नचाता और मिनटों में वह धुन बज उठती. फिर थोड़ा और बड़ा हुआ तो उसने गिटार सीखा और कॉलेज में अपना म्यूजिक बैंड बनाया और कई स्टेज शोज भी किये. पर कॉलेज की पढ़ाई के दौरान सब कुछ छूट गया. उनका मानना था कि इससे पेट नहीं भरता, गृहस्थी नहीं चलती। उसके लिए कोई रेसपेकटबल काम करो। गिटार अकेलेपन का साथी और बैंड एक सपना बनकर रह गया।   
यह सिर्फ एक राहुल की ही कहानी नहीं है. हम लोगों में से कितने लोग अपने सपने वाकई पूरे कर पाते हैं. बड़े होते होते एहसास होता है, की हम लोगों के बचपन के हुनर धीरे धीरे या तो ख़त्म हो जाते हैं , या फिर प्राथमिकताओं की भेंट चढ़ जाते हैं.  बच्चे जैसे जैसे बड़े होते हैं, हम  उन्हें  ओब्सेर्व करते हैं, उनकी  रुचियों को समझने की कोशिश करते हैं. कभी कभी उन्हें बढ़ावा भी देते हैं. पर जब ज़रा भी महसूस होता है कि उसका शौक , पढ़ाई के आड़े आ रहा है तो हम तुरंत उसपर लगाम कसकर , पढ़ाई और कैरियर का हवाला देकर , उसके शौकको दर किनार कर देते हैं . और अंतत: वह उस शौक को परस्यू नहीं कर पाता
लेकिन वह चिंगारी कहीं भीतर दबी रह जाती है और वह खालीपन जीवन में बना ही रह जाता है । वह बेमन से नौकरी करता है। हर दिन एक बोझ सा और शाम चलो एक और दिन कटा के एहसास के साथ बीतते जाते हैं। बनना चाहता था टीचर, पर बन गया इंजीनियर, या बनना चाहता था कुछ , बन गया कुछ। और अपनी शिक्षा के बोझ तले दबा वह मजबूरी में ऑफिस जाता है, मन नहीं लगता फिर भी जुटा रहता है, क्योंकि वह जकड़ा हुआ है गृहस्थी के जंजालों में, और अपनी बँधी बँधाई आमदनी के साथ कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। लिहाजा ढोता रहता है एक अनचाहा बोझ। क्या इस तरह से वह अपने प्रॉफ़ेशन को अपना 100 प्रतिशत दे पाएगा। पर ज़रा सोचिए अगर उसने अपने मनका प्रॉफ़ेशन चुना होता, कुछ  ऐसा जिसमें उसे मज़ा आता है, जो सोते जागते, उठते बैठते , उसके दिमाग पर चौबीसों घंटों हावी रहता है, तो वह कितना बेहतर  काम कर पाता। कितना खुश रहता। हो सकता है , उसके शौक के हिसाब से उसकी आमदनी मौजूदा आमद से घाट बढ़ भी सकती थी, पर वह खुश रहता।
अक्सर  सुनने में आता है , की अमुक ने अपना कैरियर छोडकर , एक बिलकुल ही अलग व्यवसाय अपना लिया। कॉर्पोरेट दुनिया में एक ऊँची पोस्ट पर होने के बावजूद, नौकरी छोड़ एक रैस्टौरेंट खोल लिया और अब बहुत खुश है । यह एक बहुत्त बड़ा निर्णय होता है, अपने सुरक्षा कवच से निकालकर, अपना कम्फर्ट जोने छोड़कर एक सर्वथा भिन्न क्षेत्र में कदम रखना , महज़ इसलिए कि वह उसका पैशन है, बहुत हिम्मत, दृढ़ता और लगन का परिचायक है. पर हिम्मत भी वही करता है जो अपनी धुन का पक्का हैं। और आखिरकार जब वह अपने शौक को कमाई का जरिया बना लेता है तो सोचता है मैंने यह पहले क्यों नहीं किया। जीवन के इतने साल बर्बाद कर दिये। पर चलो देर आए दुरुस्त आए।
यह माद्दा आजकल की पीढ़ी में काफी हद तक दिखाई देता है. अच्छी खासी लगी लगाई नौकरी छोड़कर, आर्थिक असुरक्षा की परवाह किए बगैर अपने आपको पूरी तरह से तयार करके, सही गलत, भला बुरा, नाफा नुकसान, हर चीज़ को समझकर वे अंजाने रास्तों पर चल देते हैं। वे रास्ते जो उन्हे उनके पैशन तक आखिरकार पहुँचा ही देते हैं। क्या ही अच्छा होता है अगर हम इस बात को पहले ही समझ लेते, बच्चों की रुचि को पहचान लेते और उन्हें बढ़ावा देते।   
इस दुविधा की बहुत बड़ी वजह है, माता पिता का अल्प ज्ञान। एक  ज़माना था जब गिनती के कुछ ही व्यवसाय हुआ करते थे और अभिभावकों को इससे इतर कोई भी व्यवसाय चुनना असुरक्षित और प्रतिष्ठाहीन  लगता था। आज भी यह समस्या बनी हुई है। जबकि सच्चाई तो यह है, कि अब इतने नए विकल्प मौजूद हैं, जिनके विषय में आज की पीढ़ी जागरूक है जिसे वे अपनी अपनी रुचि के हिसाब से अपना सकते हैं, अच्छा कमा सकते हैं और खुश रह सकते हैं। फिर क्यों न संवेदनशील और जिम्मेदार अभिभावक होने के नाते हम अपने बच्चों को सही दिशा चुनने में उनकी मदत करें,न कि उन्हें जीवनभर के लिए घुटनभरी ज़िंदगी के अधीन कर दें।  
ज़रा सोचकर देखिये.....