Wednesday, March 21, 2012

...और विश्वास टूट गया !





राह पर मैं अन्मनीसी चल रही थी...
एक दिन .
बिखरे पड़े पत्थरों  से एक  पत्थर लिया बिन,
घर ला उसे पूजा देवता माना...
दीवानी थी निर्बल को सबल माना ...
बहुत उम्मीद और आशाएं थी बंधी उससे...
यही मेरा साथी...
यही राह......
यही मंजिल होगी
सुख में....दुःख में... जीवन के हर आते पल में ,
मेरी उम्मीद की आखरी किरण होगी ...
फिर एक बार...
वह दिन भी आया ,
पुकारा अपने वांछित भगवन को ......
......कोई होता तो सुनता !!
मूरत की जगह एक कंकर पाया,
खुद को असहाय ...अकेला पाया..
नाथ लुप्त थे ,
शेष थी उस निर्बल पत्थर की ही काया.
और फिर बहुत रोई ..पछताई ...
वह पत्थर फिर वहीँ छोड़ आयी .
अब वही मैं हूँ,
वही राह,
वही पत्थर ढेरों......
बस वह श्रद्धा नहीं ,
शेष है तो एक विश्वास टूटा!!!!!!!

26 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  2. भाव युक्त प्रस्तुति |

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  3. विश्वास टूटे तो जुड़ता नहीं है ... इसलिए किसी भी पत्थर पे विश्वास आसानी से नहीं होना जरूरी है ... होने पे टूटना भी न जरूरी है ऐसे ही ...
    भावों का समीकरण है आपकी रचना ...

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  4. सच सरस जी !श्रद्धा और विश्वास बनाते समय हम कितना उत्साह, कितनी उमंगें रखते हैं दिल में और जब यह विश्वास टूटता है तो कितनी पीड़ा दे जाता है !
    भावपूर्ण सुंदर अभिव्यक्ति !

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  5. इस अप्रतिम रचना के लिए बधाई स्वीकारें.

    नीरज

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  6. अब वही मैं हूँ,
    वही राह,
    वही पत्थर ढेरों......
    बस वह श्रद्धा नहीं ,
    शेष है तो एक विश्वास टूटा!!!!!!!
    जब विश्वास टूटता है तो कभी नही जुडता………उम्दा प्रस्तुति।

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  7. विश्वास है तो पत्थर भी भगवान बन जाता है .... सुंदर प्रस्तुति

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  8. सच है........
    पाहन पूजें हरी मिलें..तो मैं पूजूं पहाड़....

    बहुत अच्छी रचना.

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  9. सच है........
    पाहन पूजें हरी मिलें..तो मैं पूजूं पहाड़....

    बहुत अच्छी रचना.

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  10. अब वही मैं हूँ,
    वही राह,
    वही पत्थर ढेरों......
    बस वह श्रद्धा नहीं ,
    शेष है तो एक विश्वास टूटा!!!!!!!... अक्सर यही सार रह जाता है

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  11. वही राह,
    वही पत्थर ढेरों......
    बस वह श्रद्धा नहीं ,
    शेष है तो एक विश्वास टूटा!!!!!!!
    ...bahut hi sunder abhivyakti ,badhai .

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  12. विशवास जब टूटता है तो अंतस में कुछ चटक सा जाता है..... बहुत ही सुंदरता से आपने इस व्यथा को अभिव्यक्ति दी है .

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  13. आपके ब्लॉग पर पहली बार आई हूँ....
    विचारों की बहुत ही भावयुक्त और सरल-सहज अभिव्यक्ति.....
    शुभकामनाएं......

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  14. शेष है तो एक विश्वास टूटा....sundar pakti ke sath kavy ka kalatmak aant...aur behad hi saarpurn kavita..

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  15. विस्वास एक बार टूटा तो जोड़ना बड़ा मुश्किल होता है .....पर ये एक मनस्थिति
    है वक्त के साथ ...सब कुछ बदलता है

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  16. टूटता विश्वास फिर श्रद्धा है क्या और आस्था क्या...वाह !!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  17. पत्थर तो भगवान बन जाता है, पर मन ... ? पत्थर?

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  18. बहुत सुंदर रचना है ...
    बधाई !

    बहुत खूबसूरत !

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  19. बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति,बेहतरीन सटीक रचना,......

    my resent post


    काव्यान्जलि ...: अभिनन्दन पत्र............ ५० वीं पोस्ट.

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  20. मन चाहे तो पत्थर भी भगवान बन् जाता है बशर्ते विश्वास कायम रहे..बहुत सुंदर प्रस्तुति...

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  21. आपकी भाषा और शब्दों पर पकड़ बेहतरीन है......चुने हुए और कम शब्दों में गहरी बात करती......बहुत दुःख होता है जब विश्वास टूटता है और बहुत ही मुश्किल होता है उसे दुबारा से जोड़ पाना ।

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  22. अब वही मैं हूँ,
    वही राह,
    वही पत्थर ढेरों......
    बस वह श्रद्धा नहीं ,
    शेष है तो एक विश्वास टूटा!!!!!!!... wah.......
    simply wah!

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  23. bahut khoobsurat....hindi abhi bhi hai, achha laga dekhkar :)
    keep writing

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  24. saras ji maine apki do rachnao ko padha abhi ,bahut khub darshan hai apke antah karan ka ,sundar rachnaye

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