विरह का बीज
तो उसी दिन
पड़ गया था
-
जब तुमने अचानक हाथ
छुड़ाकर
जाने का फरमान
सुनाया था
और मैं लम्हों
को छील छीलकर
-
अपनी गलती ढूंढता
रहा था .....
वह फरमान
..!
जैसे मौत की
सज़ा सुनाकर
कलम तोड़ दी
थी तुमने ..!!
आज वह बीज
एक वृक्ष बन गया
है
और मैं यहाँ
बैठा
राहगीरों को विरह्के
फल
तोड़ने से रोकता
आज भी तुम्हारी
बाट जोह रहा
हूँ
पता नहीं क्यों
...!!!
