Sunday, August 4, 2013

शतरंज



कितना खूबसूरत खेल,
सबकी परिधि तय-
सबकी चालें परिभाषित-
ऊंट टेढ़ा चलता है-
हाथी सीधा-
घोड़ा ढाई घर
और प्यादे की छलांग बहुत छोटी
सिर्फ एक खाने भर की
और शातिर दिमाग इन्ही चालों से
तय करते हैं
अंजाम खेल का ..!
काश ! यह खेल तक ही सीमित रहता ..
लेकिन अब
यह जीवन शैली बन गया है -
और जीते जागते इंसान
बन गए हैं मोहरें -
सत्ता करती है सुनिश्चित
किसे हाथी बनाना है
और किसे ऊंट या घोडा...
और आम आदमी
उनकी चालों से बेखबर
उनकी बिछायी बिसात पर
उनकी शै और मात का बायस बन जाता है ...!!!!

                   

Friday, July 26, 2013

एक दूजे का साथ ....





आज सवेरे की ही बात है , पापा नौकरानी से बात कर रहे थे ," हमने तुम्हे कल शाम को देखा था . वहीँ खुसरो बाग़ में अपने पति के साथ टहल रही थीं ".
" हाँ पापाजी गए थे ...कभी कभी समय निकालकर चले जाते हैं "
बात बहुत साधारण थी . शायद मैं भी सुनकर अनसुना कर देती , लेकिन सुशीला (नौकरानी) के लहजे में अपराध बोध मुझे कचोट गया.
अरे घूम रही थी ...तो क्या हुआ.... अपने पति के साथ अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय निकालकर घूम रही थी ...उस में शर्म कैसी ....और अपराध बोध कैसा मानो कोई चोरी पकड़ी गयी हो..!
हम लोगों में कितने लोग ऐसे हैं जो इस बात को अहमियत देते हैं, अपनी व्यस्ततताओं को परे धकेल एक दूसरे के लिए समय निकाल पाते हैं ..?
आंख खुलते ही वही रोज़ का सिलसिला, बच्चों का टिफिन बनाना , स्कूल भेजना, घर के काम निबटाना, खाना बनाना, पति को ऑफिस भेजना, खुद दौड़ते भागते ऑफिस जाना - बसों ट्रेनों में धक्के खाना (और ज़रा समृद्ध हुए तो अपनी कार से जाना )..
फिर लौटकर वही खट राग ...बच्चों की पढ़ाई, शाम के काम...
इस सब में कहीं "हमें इतना समय एक दूजे के साथ गुज़ारना है " क्या इसका का भी समावेश होता है..?
हमारी ज़िन्दगी में वह 'समय' या वह 'स्लॉट' क्या ज़रूरी नहीं है …?
ज़रा सोचिये, बच्चे बड़े होकर अपने अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं ...पढ़ाई, यार दोस्त और फिर शादी . उसके बाद होता है उनका अपना परिवार, पती/पत्नी, बच्चे ...ऐसे में जब वे हमारे लिए समय नहीं निकाल पाते तब हम सोचते हैं 'हमने तो सारी ज़िन्दगी अपने बारे में कभी नहीं सोचा...और आज इनके पास हमारे लिए समय ही नहीं'.
उम्र के इस पड़ाव पर जब हम सबको 'सेटल' कर देते हैं तो पलटकर देखने पर महसूस होता है ...हम 'कितने  'अन्सेटलड'  हो गए हैं. साथ गुज़ारा हुआ समय हमारी पूँजी होता है. यह समय हमारे रिश्तों को मज़बूत करता है , विश्वास बढ़ाता है. यह समय एक आश्वासन है की 'कुछ नहीं बदला'...."आज भी मुझे तुम्हारी उतनी ही ज़रुरत है , जितनी पहले दिन थी ".

इसलिए ज़रूरी है की पती पत्नी आपस में कुछ पल, कुछ घंटे , कुछ समय साथ साथ बिताएं - वरना आप कैसे जान पाएंगे की रिश्तों में अब भी वही संवेदनाएं ..वही एहसास...एक दूसरे के लिए वही ललक बाकी है ...!

Friday, July 19, 2013

सृजन



सृजन करती हूँ
जब भी किसी कविता का -
खोजती हूँ उसे भीतर-
टटोलती हूँ यादों को -
कुछ लम्हों को-
कुछ मिठास -
कुछ कड़वाहटों  को -
कुछ झकझोर देने वाले अहसासों को -
और पाती हूँ एक कविता
दुबकी हुई ..किसी कोने में
उसे सजा संवारकर
एक नया रूप , एक नई पहचान देती हूँ
और देखती हूँ उसे फलता फूलता ...!!!!

Monday, June 24, 2013

हथेलियाँ





यह हथेलियाँ...सच्ची हमदर्द होती हैं
बिना कहे हर बात जान लेती हैं
हर आह...हर सिसकी घुल जाती है इन लकीरों में
जब थके चेहरे को ...वजूद से अपने ढाँप लेती हैं -

दुखते रहते जब थकी पलकों के फाये हैं -
नर्म गदेलियों से हर दर्द वह सोख लेती हैं -
दर्द हजारों जो पपोटों में छिपे बैठे हैं -
उन्हें टूटकर बहने को ज़मीं देती हैं -

जग की रुसवाइयां  जब हद से गुज़र जाती हैं
हिचकियों को वह आँचल में भींच लेती हैं
या परास्त, थकी किस्मत की लकीरों को
फिरसे सहलाकर ..जीने की दिशा देती हैं-

सिर्फ ऐसा नहीं की दुःख ही वह साझा करतीं
हर ख़ुशी में भी साथ देती हैं
शर्म से लाल हो गए गालों को
मोहब्बत भरी आगोश में पनाह देती हैं ...!!!!

Sunday, June 16, 2013

शब्द ही तो हैं .....



हमें और कितना
तोड़ोगे -
मरोड़ोगे-
हमारी सहजता को द्विअर्थी जामा पहना-
और कितना तिरस्कृत करोगे ...!

यूँ तो एक अबोध बालक भी
अपनी हर बात कह लेता है
एक मूक जानवर
अपनी हर ज़रुरत जता देता है,
फिर शब्दों की क्या दरकार...!

हमारी उत्पत्ति, तुम्हारे लिए ही हुई ...
विचारों को बांटने के लिए-
अपनी बात समझाने के लिए
एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए
लेकिन तुमने -
हमारा दुरूपयोग किया..!
हमसे अपना वर्चस्व स्थापित कर
हमीं पर लांछन गढ़ दिया -
कभी लोगों को बरगलाया
झूठे वादों में उन्हें उलझाया
और अर्थों का अनर्थ कर डाला.
जानते थे प्यार की ताक़त को
तुमने फिर भी ज़हर फैलाया
मनों में.....  
सीमाओं पर उसे बोया
और हमको परास्त किया ...!

सुनो ...
अब भी मानो
हमें पहचानो
हम कुछ भी कर सकते हैं
हर ज़ुल्म से दो हाथ कर सकते हैं -
हमें बेचारा ...कमज़ोर, न समझना
हम सियासत का रुख बदल सकते हैं ...!!!

         


Thursday, May 23, 2013

मित्र नीम-




मित्र नीम-
तुम्हें कड़वा क्यों कहा जाता है ....
तुम्हें तो सदा मीठी यादों से ही जुड़ा पाया ...

बचपन के वे दिन जब
गर्मियों की छुट्टियों में 
कच्ची मिटटी की गोद में -
तुम्हारी ममता बरसाती छाँव में ,
कभी कोयल की कुहुक से कुहुक मिला उसे चिढ़ाते -
कभी खटिया की अर्द्वाइन ढीली कर
बारी बारी से झूला झुलाते 
और रोज़ सज़ा पाते
कच्ची अमिया की फाँकों में नमक मिर्च लगा
इंतज़ार में गिट्टे खेलते -
और रिसती खटास को चटखारे ले खाते....

भूतों की कहानियाँ ...हमेशा तुमसे जुड़ी रहतीं 
एक डर..एक कौतुहल ..एक रोमांच -
हमेशा तुम्हारे इर्द गिर्द मंडराता
और हम...
अँधेरे में आँखें गढ़ा
कुछ डरे... कुछ सहमे
तुम्हारे आसपास 
घुंघरुओं के स्वर और आकृतियाँ खोजते ....

समय बीता -
अब नीम की ओट से चाँद को
अठखेलियाँ  करता पाते-
सिहरते ..शर्माते -
चांदनी से बतियाते -
और कुछ जिज्ञासु अहसासों को
निम्बोरियाओं सा खिला  पाते ......

तुम सदैव एक अन्तरंग मित्र  रहे
कभी चोट और टीसों पर मरहम बन 
कभी सौंदर्य प्रसाधन का लेप बन 
तेज़ ज्वर में तुम्हें ही सिरहाने पाया 
तुम्हारे स्पर्श ने हर कष्ट दूर भगाया

यही सब सोच मन उदास हो जाता है
इतनी मिठास के बाद भी
तुम्हें क्यों कड़वा कहा जाता है ...!!!!  

Thursday, May 2, 2013

बचपन




बचपन की कुछ छवियाँ, यादों की दीवारों पर, फ्रेम में जड़ी तस्वीरों सी
अनायास ही एक मुस्कराहट बिखेर देती हैं चेहरे पर ...

आज भी याद आता है
वह माहिम क्रीक पर
हर इतवार ..समुन्दर के किनारे
सीपियाँ और घोंघे बटोरने पहुँच जाना
और माँ का सारी मेहनत को झुंझलाकर कूड़े में फ़ेंक देना
( लेकिन अगले सन्डे , फिर वही क्रम दोहराना )

व्रत उपवास में सुबह से ही माँ के आगे पीछे
खाने के इंतज़ार में घूमना
(उस दिन भूख कुछ ज्यादा ही लगती थी )

लम्बर सफ़र पर ट्रेन में बैठते ही
खाने की फरमाइश करना
( ट्रेन में घर की पूरी सब्जी आचार का मज़ा ही कुछ और होता )

आंधी पानी लू धूप की परवाह किये बगैर
हर शाम बिल्डिंग के नीचे सहेलियों के साथ खेलना
( और सर झुकाकर डांट खा लेना )

पढ़ने के बहाने छत पर सूखती इमली के ढेलों से
थोड़ी थोड़ी इमली चुराकर खाना
( और भगवान से सौरी बोलते जाना )

कभी कभी क्लास टेस्ट में जीरो मिलने पर
खुद ही साइन बनाना, और पकड़े जाना
( ग्लानि और डरके बीच झूलते हुए )


कौन कहता है बचपन 'मासूम' होता है
अलबत्ता शरारतों का पिटारा ज़रूर होता है