Sunday, September 23, 2012

हाइकू -दिया


छोटासा  दीया  
निस्वार्थता का बिम्ब 
कहाया सदा 

नन्हा सा दीया 
समेट तिमिर को 
उजाला किया 

ज़रा सा दीया 
प्रेम संकेत बन 
हमेशा जिया 

माटी का दीया  
सबल आस बन 
आंधी से लड़ा 

प्यारा सा दीया 
उगा द्वारे हुलास 
रिझाय लिया

Friday, September 21, 2012

हाइकू- मन




पिया का घर
अधकचरे रिश्ते
देखे है मन

आँखें शर्मायें
हियरा अकुलाये
आतुर मन

आँखों में तैरें
सतरंगी सपने
व्याकुल मन

पाके अकेली
सखियाँ सहेलींयां
टोहें हैं मन  

पिया की याद
हरदम सताए
झेंपें है मन


Saturday, September 15, 2012

इक्षा







इक्षा हूँ मैं -
एक सपना-
एक मृगतृष्णा -
एक सीमाहीन विस्तार -
विभिन्न रंग ...रूप ....आकार...!
उगती हूँ.... अंत:स की गहराईयों में -
खोजती हूँ उजाले -
उम्मीदों के -
संभावनाओं के -
विस्थापना का डर घेरे रहता है
आशंकाएँ सुगबुगाती हैं भीतर ...
लेकिन आस फिर भी जीता रखती है मुझे ...
जानती हूँ ...
अभी और तपना है ...
निखरना है ...
कसौटी पर खरा उतरना है
सिद्ध करना है स्वयं को
ताकि न्यायसंगत हो सके मेरा वजूद
अकाल मृत्यु का डर मझे नहीं
जब तक मनुष्य रहेगा -
कुछ पाने की होड़ रहेगी -
सपने देखने की कूवत रहेगी -
एक मरणासन की आखरी उम्मीद बनकर भी
जीवित रहूंगी मैं ....!

Thursday, September 13, 2012

हाइकू- बिटिया




गाओ बधाई
बिटिया घर आयी
फैला उजास

माता पिताकी
हमदर्द है होती 
सबकी आस

उसकी हंसी
जिलाए कुटिया को
उगे हुलास

डोली बैठाके
बिदा हुई बिटिया 
घर उदास

यादें उसीकी
बह्लायेंगी जी को
लायेंगी पास

Friday, September 7, 2012

हाइकु- परछाइयाँ




देती हैं साथ
रौशनी में ही सिर्फ
परछाइयाँ

कहलाती हैं
सच्ची दोस्त फिर भी
परछाइयाँ

तेज धूप में
सिकुड़ जाती हैं ये
परछाइयाँ

पर फैलती
सुबह शाम यह
परछाइयां

दुःख में कम
सुख में अधिक ये
परछाइयाँ

कहलाती हैं
हमदर्द फिर भी
परछाइयां

छूना चाहो तो
हाथ नहीं आती ये
परछाइयाँ

साथ होने का
दावा क्यों करती ये
परछाइयाँ

जीवन चक्र के अभिमन्यु -




अपने अपने धर्म युद्ध में लिप्त 
अक्सर देखा है उसे ...
परिस्थितियों के चक्रव्यूह 
भेदने की जद्दोजहद में .....

कभी 'वह' -
लगभग हारा हुआ सा 
उस युवा वर्ग का हिस्सा बन जाता है
जो रोज़, एक नौकरी ...एक ज़मीन की होड़ में 
नए हौसलों...नई उम्मीदों को साथ लिए निकलता है 
और हर शाम -
मायूसी से झुके कंधे का भार ढोता हुआ -
उन्ही तानों , तिरस्कार और हिकारत भरी 
नज़रों के बीच लौट आता है 
रोटी के ज़हर को लगभग निगलता हुआ ...
क्योंकि कल फिर एक और युद्ध लड़ने की ताक़त जुटानी है 
एक और चक्रव्यूह को भेदना है -

कभी 'वह '
एक युवती बन जाता है -
जो खूंखार इरादों,
बेबाक तानों और भेदती नज़रों के चक्रव्यूह के बीच
खुद को घिरा पाती है -
दहशत -
उस चक्रव्यूह के द्वार खोलती जाती है -
और वह उन्हें भेदती हुई -
और अधिक घिरती जाती है ....

कभी 'वह' 
एक विधवा रूप में पाया जाता है -
एक त्यक्ता, एक बोझ ...एक अपशकुन 
का पर्याय बन -
वह भी जीती जाती है,
भेदती हुई संवेदनाओं और कृपादृष्टि के चक्रव्यूह 
की शायद इन्हें भेदते हुए -
भेद दे कोई आत्मा -
और दर्द का एक सोता फूट पड़े -
जिससे कुछ हमदर्दी और अपनेपन के छींटे 
उस पर भी पड़ें -
और आकंठ डूब जाये 
वह उस कृपादृष्टि में 
जो भीख में ही सही -
मिली तो .....

न जाने ऐसे कितने असंख्य अभिमन्यु 
अपने अपने धर्म की लड़ाई लड़ते हुए 
जीवन के इस चक्रव्यूह की 
भेंट चढ़ते आ रहे हैं ....
और चढ़ते रहेंगे .......

Sunday, September 2, 2012

आर्तनाद





कुछ ही दिन हुए ….वह पल अब भी याद है
कोर थे भीगे हुए ......दिल से लगाया आपने
छाँव में आपकी ....कितने सुखद थे बीते क्षण
हाथ सरंक्षण भरा , था सर पे फेरा आपने .

फिर पहली बार ..जब मैंने थी स्कूल की सीढ़ी चढ़ी ...
निर्भीक और साहसी बनो ..यह ग़ुर सिखाया आपने
कल्पनाओं में भी गरथा धर दबोचा डर ने जब
कितनी सहजता से उसे .....जड़ से उखाड़ा आपने

जीवन के दुर्गम ....मोड़ पर ...जब जब भी विपदा से घिरे
एक ढाल बनकर ही सदाउससे बचाया आपने ..
एक मित्र की जब जब कमी… महसूस की मैंने कभी
एक दोस्त बनकर ही सदा ...कन्धा बढाया आपने !

फिर आज क्योंकर दूरसे ही देखते रहते हैं आप
धुंधला गया सब कुछ ...धुंए की ओट में रहते हैं आप
मन आज भी अधीर है ...उस सुख, उस संरक्षण के लिए
फिर क्यों नहीं बढ़कर लगा लेते....मुझे सीने से आप ..

ऊँगली पकड़कर हर कदम, चलना सिखाया था मुझे -
निर्भीकता साहस से लड़ना -यह बताया था मुझे -
फिर कौनसा डर...कौनसा भय ...है दबोचे मन को आज
की चाहकर भी , पास पाते नहीं, अपनों के आप.....

झूठे सहारे छोड़करउस ओर  से जाइये ...
उस ओट में दुश्वारियां ..बीमारियाँ ही हैं खड़ी
उस ओट से आता धुआं ,है लील जाता हर ख़ुशी -
फिर क्यों उसे बैसाखियाँ बना बैठे हैं आप....

जाईये इस पार फिर.... झूठे सहारे छोड़कर
पैरों में ताक़त लाइए.....बैसाखियों को तोड़कर !
इस पार जीवन है -वे सारे सुख हैं ...जो थे अपने कभी -
उस पार तो सिर्फ मौत है ...
मुँह बाए जो ...... कबसे खड़ी .....!!!!!