Thursday, September 26, 2013

नियति

 

नियति के विस्तृत सागर में
कब कौन कहाँ तर पाया है -
जिसको चाहा , रौंदा उसने
और पार किसीको लगाया है .
पेशानी पर जो लिखा है -
बस पेश उसीको आना है
कितना भी तुम लड़ लो भिड़ लो
उसका ही सच अपनाना है .
क्या देव और यह दानव क्या-
कोई भी बच न पाया है -
फिर तुम तो केवल इंसान हो -
सब पर नियति का साया है                                                                                                                                                                                                                                                
होता न ऐसा तो पांडव
क्यों दर दर भटके भेशों में -
महारानी द्रौपदी क्यों बन गयी-
सैरंध्री कीचक के देश में .
क्यों राम ने छोड़ा देस अपना -
और भटके जंगल जंगल में
था राज तिलक होना जिस दिन
वे निकले वन्य प्रदेश में.
 बस नियति ही करता धर्ता
उसके आगे सब बेबस हैं
फिर कौन गलत और कौन सही -
सब परिस्थितियों के फेर हैं .


15 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीया-

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  2. ईश्वर के द्वारा रची इस दुनियाँ मे हम कठपुतली मात्र ही हैं ...सरस जी ...!!
    प्रारब्ध के आगे हम सभी निरुत्तर हैं .....
    सह जाए प्रारब्ध उसे (मनुष्य को )तो सहना है ...
    मंथन कर ढेरों विष ,अमृत ही बहना है ....

    एक सोच दे रही है आपकी अभिव्यक्ति ....!!

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  3. सुन्दर भाव. सत्य तो यही है. नियति का जो चक्र है वो बस अपने हिसाब से चलता है.

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  4. बिलकुल सही और सत्य को प्रस्तुत्र करती पोस्ट। ……। नियति अटल है |

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  5. नियति ने ...
    पेशानी पर जो लिखा है -
    बस पेश उसीको आना है
    बिल्‍कुल सच

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  6. प्रभावी एवं सटीक अभिव्यक्ति ..... बहुत सुंदर

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  7. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (30.09.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .

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  8. नियति भी बड़ी अजीब खेल खेलती है
    कभी किसीकी खुशियों से भर देती है झोली
    कभी किसी के साथ कर जाती है क्रूर ठिठोली
    सटीक बाते कही है रचना में, बहुत बढ़िया !

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  9. बहुत सुन्दर रचना........

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  10. नियति बहुत ही बलवान होती है ...
    इस सत्य को बाखूबी लिखा है आपने ...

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  11. बहुत सुन्दर रचना है

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  12. सच .....नियति के आगे कब कौन टिक सका है

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  13. वाह... आनंद आ गया सच में...

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  14. नियति के हाथों सब ही कठपुतली बने रहते हैं .... प्रयास तो करते हैं पर होता शायद वही है जो होना होता है ।

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