Wednesday, June 13, 2012

लेखा- जोखा...




यह दुनिया शिशुपालों से भरी पड़ी है -
किस किस के पापों का हिसाब रखूँ..?
हाँ ....मैं कृष्ण नहीं हूँ -
मै हूँ एक आम आदमी-
जो ऐसे ही लोगों द्वारा -
हर कदम पर शोषित-
इसी आस में जी रहा है कि -
"वह" तो हिसाब रख ही रहा होगा इनके कुकर्मों का ....
लेकिन फिर.....
मेरी तरह अनेकों होंगे ......!!!!
किस किस का हिसाब रखे ....
मैं इतना तो कर ही सकता हूँ -
उनका कुछ तो हाथ बंटा ही सकता हूँ .....

बस इसीलिए -
गुनाह गिने जा रहा हूँ मैं -
और इंतज़ार कर रहा हूँ
उस दिनका -
जब शीषों के ढेर से भयभीत हो -
गुनाहों कि यह फेहरिस्त -
कुछ कम हो !!!!!!!!
 

21 comments:

  1. गुनाह तो जनसंख्या की तरह बढ़ते हैं और सुकर्म बेटियों की तरह कभी भी कहीं भी ख़त्म कर दिए जाते हैं .... क्या हिसाब !

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  2. गुनाहो का कोई अंत नहीं.. गहन अभिव्यक्ति..

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  3. गुनाह को देख ..गुनाह पनपता है ...
    गुनाह का अंत कैसे हो ???
    आपकी अच्छी सोच को...
    शुभकामनाएँ!

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  4. जब शीषों के ढेर से भयभीत हो -
    गुनाहों कि यह फेहरिस्त -
    कुछ कम हो !!!!!
    गहन भाव ... इनका हिसाब रखने में हांथ बटाना एक नेक ख्‍याल ... आभार

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  5. यह दुनिया शिशुपालों से भरी पड़ी है -
    किस किस के पापों का हिसाब रखूँ..?

    सच...मन बहुत व्यथित होता है...गहरी अभिव्यक्ति

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  6. गिनने से अब कुछ नहीं होने वाला सरस जी , शिशुपाल के साथ रक्तबीज भी दीखते है अब .

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  7. एक सार्थक अभिव्यक्ति।

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  8. कहाँ तक गिनेंगे.एक से चार पनपते दिखते हैं.

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  9. आज की दुनिया में कृष्ण बनना तो बहुत मुश्किल है ... पर दिन गिनना भी ठीक नहीं ... इस बेबसी से खुस ही उभारना होता है ...

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  10. बहुत ही सुन्दर रचना।

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  11. वाह,,,, बहुत सुंदर बेहतरीन गहन रचना,,,,,के लिये बधाई

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: विचार,,,,

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  12. बहुत ही बढ़िया आंटी !


    सादर

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  13. यह भी अपना अंदाज़ है

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  14. सिर्फ शुभकामनायें दे सकता हूँ ...
    आभार अच्छी रचना के लिए !

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  15. फिर से चर्चा मंच पर, रविकर का उत्साह |

    साजे सुन्दर लिंक सब, बैठ ताकता राह ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच

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  16. बस इसीलिए -
    गुनाह गिने जा रहा हूँ मैं -
    और इंतज़ार कर रहा हूँ
    उस दिनका -
    जब शीषों के ढेर से भयभीत हो -
    गुनाहों कि यह फेहरिस्त -
    कुछ कम हो !!!!!!!!

    नए अंदाज़ में कहने की बारीकी कोई आप से सीखे तो क्या कहने .....
    कहने का अनूठा तरीका बहुत भाया . कह दूँ बहुत खूब ........

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  17. काश के कम हों गुनाह................
    आशावान रहें....

    सस्नेह

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  18. बस इसीलिए -
    गुनाह गिने जा रहा हूँ मैं -
    और इंतज़ार कर रहा हूँ
    उस दिनका -
    जब शीषों के ढेर से भयभीत हो -
    गुनाहों कि यह फेहरिस्त -
    कुछ कम हो !!!!!!!!

    सौ गुनाह करके शिशुपाल को तो मुक्ति मिल गयी .... पर आज के शिशुपालों के गुनाह का कोई हिसाब नहीं ... सार्थक प्रस्तुति

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  19. सार्थक प्रस्तुति.........

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  20. कोई तो रखता है हिसाब ...गालियों की गिनते सौ पूरी होने तक !

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