Tuesday, November 19, 2013

...........पता नहीं !




अब तो केवल यादें हैं
उनके सिवा कुछ भी नहीं
वक़्त ने मुझको गुज़ारा
या मैंने वक़्त को -पता नहीं !

धुंधली सी परछाइयाँ
आ घेर लेतीं मुझको जब
धुंधली होतीं शामें तकता
सोचता क्या- पता नहीं !

कौनसी थी वह ख़ता
अनजाने में मुझसे हो गयी
छोड़कर सब चल दिए
क्यूँ जी रहा मैं  -पता नहीं !

वादा खिलाफी मैंने की
यह मान मैं सकता नहीं
कोशिशों में रह गयी
शायद कमी -पता नहीं !

अब तो अकेले रहने की
आदत है मुझको पड़ गयी
रौशनी कब मेरी थी
कब मेरी होगी -पता नहीं !

16 comments:

  1. कई बार इनमे से कुछ प्रश्नों का उत्तर आत्म-मंथन के बाद मिल जाता है, कई बार अबूझा ही रह जाता है क्यों कि समय यही चाहता है. बहुत सुन्दर रचना.

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  2. बहुत सुंदर मन के भावों को उकेरा है आपने खासकर इन पंक्तिओं में .....
    वादा खिलाफी मैंने की
    मान मैं सकता नहीं
    कोशिशों में रह गयी
    शायद पता नहीं .....बहुत सुंदर रचना ......

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  3. अब तो केवल यादें हैं
    उनके सिवा कुछ भी नहीं
    वक़्त ने मुझको गुज़ारा
    या मैंने वक़्त को -पता नहीं !
    ............... ये पता नहीं भी, कई बार अजीब सी कशमक़श में ला खड़ा करता है
    बेहतरीन अभिव्‍यक्ति

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  4. रौशनी जब खिलती है ... सब को सामान ही मिलती है ...
    मन की कशमकश को शब्द दिए हैं आपने ...

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  5. शब्दों का क्रम बरबस रोक सा लेता है.. फिर तो अर्थ और भी निखर जाता है..

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  6. इस पोस्ट की चर्चा, बृहस्पतिवार, दिनांक :- 21/11/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक - 47 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....

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    1. पोस्ट के चयन के लिए आभार राजीवजी

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  7. पता नहीं...वाकई कितनी unpredictable होती हैं ज़िन्दगी....

    सुन्दर रचना दी.
    सादर
    अनु

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  8. यादें हैं ये क्या कम है ... वर्ना तो जिंदगी में लाखों गम हैं..
    सुन्दर अभिव्यक्ति.

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  9. सुन्दर नवगीत ..

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  10. बहुत खूब !खूबसूरत रचना,। सुन्दर एहसास .
    शुभकामनाएं.

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  11. bahut hi sundar rachna...............

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  12. ऊहापोह में उलझी सी ज़िंदगी ..... कभी कभी किसी बात का कारण पता ही नहीं होता पर सहना पड़ता है ।

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