Wednesday, October 3, 2012

हाइकू - मृगतृष्णा




क्यूँ मृगतृष्णा
भटकाए वनों में
बढ़ाये आस  !

क्यूँ मृगतृष्णा
सदैव मिलन की
जगाये आस !

क्यूँ  मृगतृष्णा
अंतिम उम्मीद की
जिलाए आस !

क्यूँ मृगतृष्णा
जीने की हरदम
आखरी आस !

क्यूँ मृगतृष्णा
मंजिल को पाने की
जगाये आस !

क्यूँ मृगतृष्णा
तरसा तरसा के
हराए आस !


14 comments:

  1. सच बात है ...दोनों भाव जुड़े हैं मृगतृष्णा से ...
    बहुत सुंदर और गहन हाइकु सरस जी ...!!

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  2. सभी हाईकु बहुत उम्दा बन पड़े है..बहुत सुन्दर.. मेरी नई पोस्ट में आप का स्वागत है..

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  3. सिर्फ मृगतृष्णा ही ....बंधाए मन की आस ....
    शुभकामनाएँ!

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  4. क्यूँ मृगतृष्णा
    सबकुछ देकर
    विस्मित कर जाए ...

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  5. सभी हाइकू एक से बढ़कर एक ... इस उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति के लिए आभार

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  6. प्रभावित करती प्रस्‍तुति .

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  7. शानदार हाइकू।

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  8. क्यूँ मृगतृष्णा
    मंजिल को पाने की
    जगाये आस !

    खुबसूरत हाइकू. मृगतृष्णा को बहुआयामी रंग दिया

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  9. sunder pastuti aur chit bhi kamal hai
    badhai
    rachana

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  10. बहुत सुन्दर सरस जी....

    प्यास बढ़ गयी.....और लिखिए जल्दी.
    सादर
    अनु

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  11. तृष्णा... आपको और अधिक पढ़ने की जागते ...अद्भुत!

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  12. बहुत उम्दा हायकू और बेहद भावपूर्ण अर्थपूर्ण.

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  13. isko kya kahenge Saras jee
    saare hayku hain par
    par sabko ek saath kar den
    to ek purn kavita..

    aap behtareen ho:)

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