Wednesday, August 27, 2014

आक्रोश



अक्सर
हादसा होने के बाद....
उसके अंजाम के डर से ....
सन्नाटे गूँजा करते हैं भीतर..... !
और खड़े हो जाते हैं पहाड़ पलों के -
(एक एक पल तब
पहाड़ सा लगता है )
तुम जब आपा खो
बरस पड़ते हो मुझपर...!!
और मैं खोजती रह जाती हूँ
वजह ......
उस आक्रोश की..!!!

12 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.08.2014) को "सामाजिक परिवर्तन" (चर्चा अंक-1720)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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    1. बहोत बहोत आभार राजेन्द्रजी

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    2. बहोत बहोत आभार राजेन्द्रजी

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  2. शांत और स्थिर चित्त का मंथन ....सारगर्भित ....!!

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  3. बहुत कुछ कह दिया कुछ शब्दों में...बहुत सुन्दर

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  4. आक्रोश एक परिवर्तन है - कभी स्वयं के लिए,
    कभी सामनेवाले के लिए

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  5. आक्रोश की वजह नहीं ? बस निकालने का माध्यम होता है.
    कम शब्दों में बड़ी बात कही आपने.

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  6. न जाने कब चेतना लौटेगी समय रहते।
    --
    सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. सच है अंजाम का डर चैन नहीं लेने देता. बहुत सुन्दर रचना.

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  8. और मैं खोजती रह जाती हूँ
    वजह ......
    उस आक्रोश की..-----

    इस खोज का न कोई सिरा है न अंत--- हम जानते हुए भी
    सुख की खोज जारी रखतें हैं ----
    मन का सच-- बहुत सुन्दर
    उत्कृष्ट
    सादर ----

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  9. शायद हादसे के अंजाम का डर ही आक्रोश ला देता है ...

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