Thursday, March 27, 2014

ख़्वाब -






नीलाभवर्ण बादलों में छिपी बूँदें 
वे ख़्वाब हैं 
जो देखे थे हमने 
कभी झील के किनारे उस बेंच पर 
कभी बारिश में ठिठुरते हुए 
तो कभी 
तुम्हारी छूटती ट्रेन को दौड़कर पकड़ते हुए 

सोचा न था कभी 
वाष्प बन 
वह हो जायेंगे दूर 
हमारी पहुँच के परे 

लेकिन 
संवेदनाओं की नमी
उन्हें दूर न रख सकी 
अब्र कणों से फिर बिछ गए  
चहुँ ओर......


12 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.03.2014) को "
    जय बोलें किसकी" (चर्चा अंक-1565)"
    पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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    1. हार्दिक आभार राजेंद्र कुमारजी

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  2. आपकी यह पोस्ट आज के (२७ मार्च, २०१४) ब्लॉग बुलेटिन - ईश्वर भी वेकेशन चाहता होगा ? पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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    1. हार्दिक आभार तुषारजी

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  3. बहुत सुन्दर !
    लेटेस्ट पोस्ट कुछ मुक्तक !

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    1. आपका हार्दिक आभार शास्त्रीजी

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  5. सुन्दर रचना।
    पढ़कर अच्छा लगा।

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    1. आपका हार्दिक आभार शास्त्रीजी

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    1. आपका हार्दिक आभार ..!

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  7. वाह ... किसी भी रूप में बस ख्वाब तो हैं ...

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