Tuesday, February 18, 2014

अश्मिभूत



तुमने एक बार फिर
उस सतह को बींधा
जिसके नीचे दबे थे
बहुत से अहसास-
अनगिनत सपने-
कुछ वादे-
कुछ टूटे
कुछ अनछुए-
कुछ कोशिशें-
उन्हें निभाने की
कुछ टुकड़े कमज़ोर पलों के -
जो वक़्त से छूटकर -
छितर गए थे -
और साथ ही बिखर गयी -
हर उम्मीद -
उन्हें दोबारा जीने की -

छेड़ा होता
उस शांत नीरव सतह को -
तो हो सकता है
सब कुछ -
वक़्त के बोझ तले जो जाता
अश्मिभूत !
.........................

रहता तो भीतर ही...!!!

14 comments:

  1. सहचर होने के एहसास के साथ …

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  2. पर उसे भीतर क्यों रहने दिया जाए ... वो एहसास तो जीने के लिए हैं न की दफ़न करने ... भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...

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    1. परिस्तिथियाँ नासवा जी .....आभार आपका !!!

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  3. न छेड़ा होता तो....
    प्रश्न अबूझ है .
    बहुत सुन्दर लिखा है

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  4. न छेड़ा होता
    उस शांत नीरव सतह को -
    तो हो सकता है
    सब कुछ -
    वक़्त के बोझ तले जो जाता
    अश्मिभूत !
    .....................

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  5. न छेड़ा होता
    उस शांत नीरव सतह को -
    तो हो सकता है
    सब कुछ -
    वक़्त के बोझ तले जो जाता
    अश्मिभूत !
    sunder abhivyakti
    rachana

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  6. न छेड़ा होता
    उस शांत नीरव सतह को -
    तो हो सकता है
    सब कुछ -
    वक़्त के बोझ तले जो जाता
    अश्मिभूत !

    सुंदर पंक्तियाँ...

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  7. उछाला हुआ कंकड़ शांत झील में भी उथल पुथल मचा देता है !
    भावनाओं की उथल पुथल का सुन्दर चित्रण किया है !

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  8. न छेड़ा होता
    उस शांत नीरव सतह को -
    तो हो सकता है
    ..........बहुत गहन और सुन्दर !!

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  9. बहुत ही सुन्दर भावनात्मक कविता ..

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  10. पता नहीं कि सब दबा रहता या नहीं लेकिन कभी कभी सब कुछ बाहर निकलना भी ज़रूरी है .

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