Monday, May 3, 2021

 


२२ मार्च को खबर मिली कि सागर सरहदी नही रहे..!

बहुत ही दुःखद खबर..!

दसवीं कक्षा में थे तबसे जानते थे उन्हें। अक्सर हफ्ते में एक बार घर ज़रूर आते। हर शनिवार गोष्ठियाँ होतीं घर पर, उनमें सागर अंकल भी शिरकत करते। 

उन्हें पैदल चलने का बहुत शौक था। यह उन दिनों की बात है जब वे वर्ली में रहते थे, और हम बांद्रा में। टैक्सियों की स्ट्राइक जब होती तो वे पैदल वर्ली से हमारे घर चले आते। ताज्जुब होता..!

"आप थकते नही', हम अक्सर पूछते। वे हँसकर कहते "चलने से में नही थकता। जितना चाहो चला लो। मेरा पसंदीदा शगल है।"

हम लोगों ने उनका नाम 'पदयात्रा अंकल ' रख दिया था।

एक और खासियत थी उनकी। उनके बाल सफेद और मूँछें बिल्कुल काली थीं। जब भी उनसे पूछा यह कैसे, तो हँसकर कहते, " अरे ये उगीं भी तो 16 साल बाद..!

बाजार और कभी कभी, का ट्रायल दिखाने ले गए थे। तब हम छोटे थे, पहली बार ट्रायल रूम देखा था। 

बहुत सी यादें जुड़ीं हैं उनसे। विवाह पश्चात हम अलाहाबाद आ गए। जब घर जाना होता तब अवश्य मिलने आते। फिर तो वर्षों उनसे भेंट नही हुई। अभी कुछ वर्ष पहले अलाहाबाद आये थे। हमें पता न था। जब अगले दिन अखबार में पढ़ा कि उन्हें अलाहाबाद में 'लाइफटाइम अचीवमेंट' से सम्मानित किया गया है, तो तुरंत पता लगाया कहाँ रुके हैं। वे यात्रिक में रुके थे। जब फ़ोन किया तो रात काफी हो चुकी थी। जब याद दिलाया "अंकल हम सरस बोल रहे हैं", तो उन्हें याद करने में कुछ समय लगा। उनकी बोली से एहसास हो रहा था, कि उम्र ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया है। दिमाग पर ज़ोर दिया। हमने फिर कहा, "अंकल शब्द कुमार जी की बेटी।" एक दम से थकी सी आवाज़ चहक उठी।

" अरे बेटा तुम..!यहाँ कैसे।"

हमने कहा "अंकल शादी करके यहीं तो आये थे।

आपके आने की कोई खबर ही नही मिली नही तो हम भी उस प्रोग्राम में आते, आपको अवार्ड लेता देख, खूब जोरसे तालियाँ बजाते।"

वह हँस दिए, "क्या बताएँ बेटा इन लोगों ने बुलाया और मुझे ले आये। में तो आने की हालत में भी नही था। हमें याद ही नही रहा। उम्र हो गयी है अब। कब आ रही हो मिलने।"

मन हुआ उड़कर पहुँच जाएँ। पर रात बहुत हो चुकी थी, और वे थके हुए थे। हमने कहा "कल सुबह आयेंगे उनके आपसे मिलने।" वे बोले "बेटा हम तो सुबह सुबह निकल जायेंगे"

हम मन मसोसकर रह गए। कहा, "चलिए वहीं मुम्बई आकर ही मिलते हैं।"

मिलना टलता गया। और आज यह खबर..!

इतने प्रसिद्ध थे, उतनी सारी हिट्स दीं, सिलसिला, कभी कभी, बाजार, चाँदनी,इत्यादि। पर लेशमात्र भी घमंड नही था उनमें।

इत्तेफ़ाक़ से हमें गूगल पर उनकी वह तस्वीर मिल गयी, जैसा हमने उन्हें शुरू में देखा था। 

आप हमेशा याद रहेंगे अंकल..!

विनम्र श्रद्धांजलि...!


सरस दरबारी


 


 


तुम अब कूच की तैयारी करो...!



कोरोना इस शब्द से जितनी दहशत होती थी उतनी ही चिढ़ होने लगी है। बस कर भाई। यह कैसी प्यास है तुम्हारी जो बुझती ही नही। खप्परों खून पी गये, नर मुंडों का ढेर लगा पड़ा है, मरघट पटे पड़े हैं लाशों से, घरों में हाहाकार, दिलों में चीत्कार मचा है, पर तुमपर कोई असर नही हो रहा है, गिद्ध की तरह अब भी चोंच और पंजे गढ़ाए हो..!

लेकिन याद रखना, बार बार एक ही जगह पर चोट, उसे सुन्न कर देती है। हम भी सुन्न होते जा रहे हैं। और जिस दिन पूरी तरह सुन्न हो गए, तुम्हारा आतंक मिट जाएगा। नेस्तनाबूत हो जाओगे तुम। यह बात और है तब तक कितनों के घर बर्बाद कर जाओगे। 

आँगन से किलकरियाँ छीनी, सरों पर से छत, बड़ों का आशीष छीना तो कहीं जीवन से आश्रय।

 तुम पहली बार दहशत बनकर आये थे। लोग सहम गए थे, घरों में दुबक गए थे। उस गली से  दूरी रखते, उस मोहल्ले से न गुजरते जिसमें किसी को कोरोना हुआ होता। हउआ बन गए थे तुम। तुमने अपनी इज़्ज़त बना ली थी समाज में। लोग तुम्हारा मान रखते थे, दहशत ही से सही, पर कुछ इज़्ज़त थी तुम्हारी। अब लोग गालियाँ देते हैं तुम्हें, बद्दुआएं बरसती हैं तुमपर। 

तुम जब पहली बार आये थे, तो तुमने हमें हमारी गलतियों का एहसास  करवाया था। प्रकृति के साथ मिलकर कैसे रहा जा सकता है, यह पाठ पढ़ाया था। मछलियाँ तटों के करीब आ गईं थीं, पशु सड़कों पर विचरने लगे थे, पंछियों की बोलियाँ फिरसे रस घोलने लगीं थीं। बरसों से प्रदूषण के धुंध में छिपीं बर्फीली पहाड़ों की चोटियाँ दिखने लगीं थीं।आकाश, वायु जल सब  हमारा हस्तक्षेप न रहने से स्वच्छ प्रदूषण रहित हो गए थे।

 आश्चर्य आश्चर्य घोर आश्चर्य...यह भी तुम्हारी ही देन थी।

 सदैव अपनी दुनिया, सोशल मीडिया में लिप्त रहनेवालों को घर का , अपनों का महत्व समझाया था। घर की दाल रोटी में भी स्वाद है, यह जताया था। हम कितनी फिजूलखर्ची करते हैं, यह एहसास दिलवाया था। 

पर अब धिक्कार है तुमपर..!

तुमने इंसान को लालच का ऐसा घड़ा बनाकर छोड़ दिया, जिसका पेट भरता ही नही, तुमने मनुष्य को एक कफन नोच दानव बना दिया, जो बेबस, बीमार, मजबूरों का खून चूस रहा है। उनकी चिता पर अपनी रोटी सेक रहा है। लोग बीमारों को लेकर अस्पताल अस्पताल घूम रहे हैं, इलाज को तरस रहे हैं, और तुम्हें सिर्फ पैसा दिख रहा है...!

जिन अस्पतालों की तरफ कोई देखता न था, वह जीभर कर उगाही कर रहे हैं। ऑक्सीजन जैसी चीज किसे प्रकृति ने इफ़रात में दिया, उसीका मोल लगा काला बाजारी कर रहे हैं। लोगों की साँसों का सौदा कर रहे हैं। 

ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कला कृति हैं वह, यह भी भूल गया..!

तुमने बहुत कोशिश की, पर फिर भी 'कुछ' लोगों से हार गये। वे जो अपनी परवाह न कर तुमसे लोहा लेने को आगे बढ़े। वे जो अपनी संपत्ति बेचकर ज़रूरतमंदों की सहायता कर रहे हैं। वे जो दिन रात एक कर, सहायता पहुँचाने को तत्पर है। ऐसे भी लोग हैं दुनिया में, और ऐसे लोग ही तुम्हें तुम्हारी औकात बताएँगे। कर लो जितना ज़ुल्म चाहो, बिगाड़ दो इंसानों की नस्ल, पर यह मुट्ठीभर लोग अडिग रहकर तुम्हें धता बता रहे हैं। बस कुछ दिन और कर लो मनमानी, तुम्हारे दिन भी चुकने को हैं। तुम्हारे पाँव अब उखड़ने को है। रात कितनी भी काली हो, भोर नही रुकती । अब भी नही रुकेगी। बाँधो अपना बोरिया बिस्तर और हो जाओ दफा। बस कुछ दिन और..!

हफ्ता दो हफ्ता..!

चलते बनो। जब तक  निस्वार्थ लोग इस दुनिया में रहेंगे, बड़ी से बड़ी आपदा के पाँव उखड़ जाएँगे। 

तुम भी कूच की तैयारी करो..!


सरस दरबारी


Friday, November 27, 2020

देह समाई पंच तत्व में

 











देह समाई पंच तत्व में

घाटों पर मन ठहर गया है 


चलती जाती रीत जगत की 

जो आता 

उसको जाना है 

कर्म यहाँ बस रह जाते हैं 

रीते हाथों ही 

जाना है 


काया भोगे रह रह दुर्दिन 

स्मृति में आनन ठहर गया है 


जीवन के खाली पन्नों पर 

स्मृतियाँ रुक रुक  

छपती जातीं 

अंतस के गह्वर से उठ वह  

नैनों से फिर 

बहतीं जातीं 

भवसागर तो पार किया पर

कर्मों का धन ठहर गया है 


कंटक पथ पर हारा गर मन  

तो स्मृतियाँ

क्षमता बन जातीं

उनकी दी तदबीरें बढ़कर  

परिभव में 

साहस उकसातीं 


कब हो पाये दूर वह हमसे 

आशिष पावन ठहर गया है 


सरस दरबारी  



Saturday, November 7, 2020

विस्फोट


विस्फोट यूँहीं नही हुआ करते..

सब्र का ईंधन

भावनाओं का ताप

आक्रोश का ऑक्सीजन

जब मिलते हैं

सब्र गड़गड़ाता है

भावनाएँ खदबदाती हैं

आक्रोश धूल, गारे की शक्ल में

आसमान स्याह कर देता है

तब होता है विस्फोट..

जब भूख मुँह चिढ़ाती है

मक्कारी 

हर दौड़ जीत जाती है

और सच 

बैसाखियाँ साधता रह जाता है

तब होता है विस्फोट…


जब बिलबिलाती जनता को

 महलों से रानी फरमान सुनाती है

रोटी नही तो केक खा लो

राजा की बग्घी तले मासूम

दौड़ाकर कुचले जाते हैं

तब होता है विस्फोट…

तब होती है क्रांति

झुलस जाता है ऐशो आराम

झूल जाती है बादशाहत..

फाँसी के फन्दों पर

बुनाई करते हुए

गिनती जाती है

सताई हुई जनता

कटते हुए सिर

बच्चों, बूढ़ों, स्त्रियों के…

वहशियत नमूदार होती है फिरसे

अलग रूप में 

अलग पलड़े पर

होता है एक और विस्फ़ोट

तबाह करता हुआ

नसलें

इंसानियत

और

खुदा का खौफ...!


सरस दरबारी


Friday, November 6, 2020

औरत तुम भी कमाल हो


कब समझोगी कि

पुरुषों की नज़र में

तुम्हारी अच्छाइयाँ 

तुम्हारी कमजोरियाँ

ही रहेंगी…


हर रूप में हारी हो

बेटी होने के नाते

प्राथमिकताओं से

जो भाई के पक्ष में रहीं…

बीवी होने के नाते 

कर्तव्यों से

जो सिर्फ तुम्हारे हिस्से में रहे…

माँ होने के नाते

त्यागसे जो सदा तुम्हारा

फ़र्ज़ रहा…

बेटे और पति की अनबन में 

 तारतम्य की लचीली 

डोर पर,

बिना बाँस चलती रहीं

बार बार गिर

टूटतीं रहीं…

तुम्हारा समर्पण 

उछाला जाता रहा

फुटबॉल सा

पाले बदलते रहे

कभी एक की ताकत बनीं

तो दूसरे की… 

बिखरतीं रहीं

बार बार सिमटती रहीं 

पारे सी…

अनुभव सिखाता है

पर तुम रहीं मूर्ख की मूर्ख

अनुभवों से भी न सीखा...

छीजती रहीं

मिटाती रहीं 

अपना अस्तित्व

ओस की बूँद सम...

बिछी रही कदमों में 

हरसिंगार सी

बिखेरती रहीं खुशबू 

शीतलता, स्नेह ...

तुम्हारे हिस्से क्या आया ? 


सरस दरबारी 


Monday, October 19, 2020

बरगद होता है पिता




बरगद होता है पिता

शाखाएँ फैला

जोड़े रहता है

कुनबे को...

जेठ के ताप

भादों की वृष्टि

पूस के शीत को

कंधों पर रोकता

पालता है

परिवार को....

करता है

अनगिनत त्याग

कहलाता है स्वार्थी ...

झुकता भी है

मिन्नत करता है

साहूकार से

हर निवाले के लिए

और रहता है सदा

उपेक्षित...

नही बाँट पाता अपना स्नेह

अपनी चिंता

अपनी मजबूरी

किसी और से...

फेर लेता है स्नेहभरा हाथ

सोए हुए शीशों पर

बना रहता है कठोर

कि अनुशासन रहे...

क्रोध का मुखौटा

कर देता है दूर

अपनों से

सहता है पीड़ा

अकेलेपन की

दंश हृदयहीन होने का...

होता जाता है विलग

कुनबा उससे,

वह कुनबे से

उसका योगदान रह जाता है

अनकहा

अनगुना...!


सरस दरबारी






Friday, July 31, 2020

त्राण- लघुकथा



वह एक डरावनी रात थी। दूर से फौजी जूतों की पास आती ध्वनि, पूरे मोहल्ले में मृत्यु का आतंक फैला रही थी। देश के तानाशाह ने एक नया फरमान जारी किया था। एक विशेष समुदाय के लोगों को खोज खोजकर कोण्सेंट्रेशन कॅम्पस में ठूँसा जा रहा था। प्रतिरोध करने वालों को तुरंत मौत के घाट उतार देने का फरमान था। लोग छिपते फिर रहे थे। घरों के दरवाजे तोड़कर लोगों को तहखानों से घसीट घसीटकर लाया जा रहा था।
धर्म, मानवता, संवेदनशीलता कूड़े के ढेर पर दम तोड़ रहे थे। मनुष्य बेबसी से उन्हें मरते देख रहा था। 
दया, क्षमा, की संभावनाएँ ध्वस्त हो चुकी थीं। अब तो केवल प्रतीक्षा थी, पल पल पास आती मृत्यु की, जो आज या कुछ दिनों, महीनों बाद कॅम्पस में अनिवार्य थी। एल्ली अपनी तीन बहनों के साथ तहखाने में छिपी थी। एक एककर घर के सदस्य मारे जा चुके थे। आज इनकी बारी थी। वह चारों एक दूसरे के कंधों पर बाहें डाल, एक घेरा बनाकर खड़ी हो गईं। 
“मरना तो हमें है ही। क्यों न हम इन अंतिम पलों को खुशी खुशी गुजारें। पास आती मृत्यु के अस्तित्व को ही हम क्यों न कुछ पलों के लिए नकार दें। चलो हम सब मिलकर खूब नाचें गाएँ। ताकि मौत की अनिवार्यता में साथ बिताए यह खुशी के कुछ पल, उसकी भयावहता को कम कर दें। ताकि काल कोठरियों की उस नश्वरता  में जब हम  एक दूसरे को याद करें, तो हम सबका हँसता हुआ चेहरा आँखों के सामने उभरे, मृत्यु की विभीषिका से आतंकित चेहरा नहीं।” 
और वह सभी बहनें गाने लगीं, नाचने लगीं। उन्होने ऊँचे बर्फीले पहाड़ों से बहते झरनों के, बागों के खिलते सुंदर फूलों के, समुंदर के , आसमानों में उड़ते स्वतंत्र पंछियों के गीत गाये। उन्होने इन स्वप्नों के गीत गाये, जो पूरे न हो सके, उन्होने आश्वासनों के गीत गाये, कि वह पूरे होंगें। अगले जन्म में ही सही। वे नाचती रहीं, गातीं रहीं, खिलखिलाती रहीं। मौत की आहट पास आती गई। 
फौजी जूतों की निकट आती ध्वनि के साथ, उनके गीतों और नृत्य की गति तेज़ होती गई। 
वह दंड, अत्याचार और मृत्यु के भय से कहीं ऊपर उठ चुकीं थीं।

सरस दरबारी