Sunday, January 1, 2023

मंगलामुखी – एक उजास ...!


मंगलामुखी – एक उजास ...!


डॉ॰लता अग्रवाल का उपन्यास हाथों में है। किन्नरों पर आधारित इस उपन्यास की प्रस्तावना पढ़ी, जिसमें पायल फाउंडेशन की डायरेक्टर, किन्नर गुरु, पायल सिंह ने लिखा है, 

हमें न्याय दिलाता उपन्यास...!

और उपन्यास पढ़ते हुए महसूस हुआ, कितना सही लिखा है उन्होंने। 

किन्नर हमेशा से ही समाज के लिए एक रहस्य रहे हैं। एक भय मिश्रित जिज्ञासा, इनके प्रति, सदैव बनी रही है। यह उपन्यास उन सारी जिज्ञासाओं का निवारण करता चलता है। 

मंगलामुखी किन्नरों के जीवन पर लिखा केवल एक उपन्यास नहीं है...!

मंगलामुखी दस्तावेज़ है, उनके सुख दुःख का, छोटी छोटी खुशियों का। 

मंगलामुखी खुलासा है, अपनों के दिए ज़ख्मों का, तिरस्कार का, गहन विषाद का…!  

मंगलामुखी किन्नरों की व्यथा गाथा है, उनका जीवन है, पर्त दर पर्त खुलता हुआ।

मंगलामुखी किन्नरों के जीवन की वह तस्वीर है, जो समाज की नज़रों से ओझल रही है।

यह तस्वीर तभी साकार होती है, जब डॉ लता अग्रवाल जैसा कोई हमदर्द उन्हें करीब से देखता, उस दर्द को महसूसता और बाँटता है। उनके दुःख से विचलित हो, उनकी ख़ुशी में शरीक होता है। 

यह कहानी शकुन की है।  

अनब्याही शकुन, जिसे मिला, प्रेम में धोखा और एक अनचाहा गर्भ। अपने परिवार को शर्मिंदगी से बचाने के लिए तालाब में कूद पड़ी थी, जहां पूजा के लिए लोगों की भीड़ थी। पूर्वाग्रहों से ग्रस्त, स्त्री पुरुषों में से कोई उसकी जान बचाने नहीं आया, तब एक किन्नर ने तालाब में कूदकर उसकी जान बचाई। 

नपुंसक कौन...? 

यह प्रश्न उपन्यास में कई बार उठता है। किन्नर तो बेचारे शरीर से,नियति से मजबूर हैं, इसीलिए नपुंसक कहालते हैं, पर आम आदमी की सोच, उसके आचरण और स्वार्थ ने उसे नपुंसक बना दिया है। 

अपनों द्वारा ठुकराई हुई शकुन, बच्चे को जन्म देना चाहती थी। किसीने गर्भ सींचकर उसे ठुकरा दिया, तो उसमें बच्चे का क्या दोष....!

 उसका जीने का अधिकार क्यों छीना जाए?

और शकुन बच्चे को जन्म देने का निर्णय कर लेती है। और वही किन्नर समाज, ढाल बनकर उसके पीछे खड़ा हो जाता है। उसी की आँखों से हम उनकी दुनिया देखते हैं, समझते हैं। शकुन ही वह सेतु है, जो किन्नरों के जीवन के अनजाने पहलु, पाठक तक पहुँचाता है।

यह कहानी है शिल्पा गुरु की।  

शिल्पा गुरु, किन्नरों की मुखिया, जो उसकी जान बचाकर, किन्नरों के डेरे में, आसरा देती हैं। शिल्पा गुरु जिसे सब बाप का दर्जा देते थे, शकुन के लिए साक्षात् माँ बनकर आयी। नाल का रिश्ता न सही, दर्द का सम्बन्ध तो बन ही गया था। उसकी ममता के आँचल में उसे और उसकी बेटी अनु को परिवार का संरक्षण और असीम स्नेह मिला। 

यह कहानी है मणि शर्मा उर्फ महेंद्री की। 

कक्षा की सबसे होनहार छात्रा। छोटी सी मणि को एक दिन उसके स्कूल की सहेलियाँ ‘सूसू’ करते देख लेती हैं। और मणि की ज़िन्दगी बदल जाती है। जो राज़ अब तक समाज से छिपा था, उजागर हो जाता है, और समाज में उसका बहिष्कार हो जाता है। किन्नरों की टोली आकर रोती कलपती मणि को छीन कर ले जाते हैं। उसके सारे सपने एक झटके में बिखरकर छितरा जाते हैं और प्रतिभाशाली मणि, महेंद्री बन जाती है। महेंद्री जो शिल्पा गुरु के बाद, उस गुट की मुखिया बनती है। 

शिल्पा गुरु के बाद वह स्नेह, वह अपनापन, शकुन और उसकी बच्ची अनु को महेंद्री से मिलता है, जो अपनी वेश भूषा बदल, कुरता पजामा पहन, बन जाती है अनु का पिता महेंद्र और अंत तक एक पिता होने का दायित्व निभाती है। 

मनको छू लेने वाला उपन्यास। 

गज़ब का शब्द विन्यास...! 

किन्नरों की बोली, जिसमें बात बात में गाली गलौज है, उनके हावभाव, ताली बजा बजाकर अपनी ख़ुशी या रोष जताना, संवादों के बीच लेखकीय प्रवेश, हमें उनके जीवन के हर पक्ष से मिलाता चलता है। उनकी पीडाओं से और करीब से जोड़ता है। वह कहती हैं, “समाज से मिली उपेक्षा और अपनों के दिए घावों ने जो कड़वाहट, जो पीड़ा उनके अन्दर भर दी थी, उन्हीँ घावों से रिसता मवाद, उनकी बोली और व्यवहार में दिखाई देता।” 

किन्नरों की भाषा, उनके हावभाव का हूबहू वर्णन बहुत ही सूक्ष्म अवलोकन और श्रम से संभव है, जो इस उपन्यास को विशेष बनाता है। उनके अंतर्भावों को कितनी शिद्दत से महसूस किया है लता जी ने। 

हमारे पूर्वाग्रहों के रहते, समाज द्वारा, जाने अनजाने, उनके प्रति कितना अन्याय, कितना अनिष्ट होता है, उसका एहसास इस उपन्यास को पढ़कर देर तक सालता रहा। वाकई, क्या भूल है उनकी, जो इतना तिरस्कृत जीवन जीने को मजबूर हैं, एक गुमनाम जीवन और अनजान मौत पाने को अभिशप्त। रात के सन्नाटे में चप्पलों से पीटकर जिनकी अंत्येष्टि होती है, ताकि पुन: ऐसा तिरस्कृत जन्म न मिले। 

पर उपन्यास का अंत संभावनाओं का उजास लेकर आता है। और इनके लिए एक बेहतर जीवन का विकल्प दिखाई देता है। उपन्यास का यह सकारात्मक अंत आश्वस्त करता है, कि भोर होने को है। 

डॉ लता अग्रवाल जी को इस अनुपम उपन्यास के लिए ढेरों बधाइयाँ और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ। उनकी कलम यूँही निरंतर चलती रहे ।  


सरस दरबारी 

      



Saturday, December 17, 2022

मॉर्निंग वॉक – बाल हठ


मैया मैं तो चाँद खिलौना लैहौं । अब बताइये मैया चाँद कहाँ से लाकर दे। लेकिन नन्हें कृष्ण ने तो ज़िद ठान ली। यानि कि बालहठ की समस्या, द्वापर युग अर्थात 864,000 वर्ष पहले से चली आ रही है ।
बाल कृष्ण यहीं पर नहीं रुके। उसके साथ ‘अन्यथा’ भी जोड़ दिया। अगर हमारा हठ पूरा न किया तो
जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं॥
सुरभी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं।
ह्वै हौं पूत नंद बाबा को , तेरौ सुत न कहैहौं॥
आगैं आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहि न जनैहौं।
यशोधा मैया भी समझदार थीं, उन्होने बहला दिया, डिसट्रैक्ट कर दिया ,
हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहनिया दैहौं
और कन्हैया को सौदा पसंद आ गया...!
तेरी सौ, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं।
तो इस तरह, बाल कृष्ण तो दुलहनियाँ के नाम पर मान गए। उन्होने अपना बाल हठ छोड़ दिया।
‘बालहठ’, अनादीकाल से चली आ रही समस्या है, और समय और ज़रूरत के हिसाब से इसके निवारण के तरीके भी बदलते रहे हैं।
अभिभाबवाक अपने बच्चे को खुश देखना चाहते  है। और उसके लिए अपनी
क्षमता नुसार, हर संभव प्रयास करते हैं। दोनों, पैसे कमाने में जुट जाते हैं।
 जिससे पैसे तो आते हैं, लेकिन और बहुत कुछ खो जाता है।
दरअसल वर्तमान पीढ़ी के बच्चों ने दुनिया देखी है। आखिर वर्ल्ड वाइड वेब का ज़माना है, बच्चे से लेकर बूढ़े तक सब इसी वेब में उलझे हुए हैं। और मज़े की बात तो यह है, कि इसमें कोई छटपटा भी नहीं रहा(जैसे अमूमन शिकार मकड़ी के जाल में तड़पता है) । सब मस्ती में झूला झूल
 रहे हैं।
हाँ तो आधुनिक बच्चे, चूँकि अधिक एक्स्पोसेड़ हैं, उनमें जागरूकता या कहें
अंतर्जाल पर उपलब्ध ज्ञान भी अधिक है। जो बड़ों की निगरानी के अभाव में
 उन्हें अनचाहे रास्तों पर धकेल सकते हैं। कच्ची उम्र में जब उन्हें मार्गदर्शन
की ज़रूरत होती हैतब उन्हें नौकरों और आयाओं के सुपुर्द कर दिया जाता है।
जिस वक़्त उन्हें माता पिता के प्यार और संरक्षण की आवश्यकता होती है, तब उन्हें कीमती विडियो गेम्स, फोन के लेटैस्ट मॉडेल्स देकर उस कमी को पूरा किया जाता है। इतनी आसानी से मिली चीजों का कोई महत्व नहीं रह जाता।
 धीरे धीरे खीज और ऊब अपनी जड़ें जमा लेती है। और फिर बात बात में
रूठना उनकी आदत बन जाती है। क्या चाहते हैं, यह वे स्वयं नहीं समझ
पाते,और अंतत: उसकी तलाश में भटक कर ड्रग्स, नशे की ओर उन्मुख होते हैंऔर गलत रास्तों पर चल पड़ते हैं। गलत सोच पालने लगते हैं। बरगलानेवालों इसी मौके की तलाश में रहते हैं। मौके बेमौके दूसरे अभिभावकों से आपकी तुलना कर आपको नीचा दिखाने में वे तनिक नहीं हिचकिचाते। यह सौदा अभिभावकों को बहुत महंगा पड़ता है। बच्चों का बड़ों के प्रति सम्मान, उनकी संवेदनशीलता, उनका बचपन ...! इस सौदे में, यह सब खो जाता है।
इसमें बच्चों का कितना दोष है ? क्या नौकर आयाएँ उसे वह संस्कार, वह
स्नेह वह अपनापन दे सकते हैं, जिनकी उसे उस पड़ाव पर सबसे अधिक
ज़रूरत है ? बच्चा उस जज़्बे को कैसे समझ सकेगा जिससे वह स्वयं वंचित
रहा ?
क्या पैसों और स्टेटस की एवज में यह कीमत कुछ अधिक नहीं?
 
सरस दरबारी   
 
 
 
 
 
 
 
 

 


Tuesday, July 27, 2021

बाजारवाद

 



यह कोई ४५
, ४६, वर्ष पुराना किस्सा है. हमारी माँ के बाल बहुत झड रहे थे. उन्हें किसी ने सलाह  दी, कि फलां आयुर्वेदिक तेल गिरते केशों के लिए बहुत लाभप्रद है. माँ  ने वह तेल मँगवा लिया. और वाकई, चमत्कारिक असर हुआ. उनके बाल न सिर्फ गिरने बंद हो गए, बल्कि ४, ५ महीने में उनके सफ़ेद  बाल काले होने लगे और लम्बे भी.  भई वह तेल तो हिट हो गया. मम्मी की तो लाटरी लग गयी. फिर उन्होंने जीवनभर वही तेल इस्तेमाल किया.

 हम इस  वाकये को लगभग भूल चुके थे. कोई १५  वर्ष पहले, इनके एक मित्र की माता ने हमसे  वही शिकायत की. झट वह तेल याद आ गया, और हमने उन्हें उसका  नाम बता दिया. हालांकि वह तेल महंगा था . छोटी सी ५० एम् एल  की शीशी १०० रूपये की थी. उसपर कुछ ताकीदें लिखी थीं.  तेल  लगाते समय ध्यान रहे, कि केशों में नमी हो. कुछ बूँदें हथेली पर लेकर पोरों से हलके हलके चाँद पर मलना है. एक शीशी काफी दिन चल जाती थी. यही हिदायत हमने उन्हें दे दी.

उन्हें भी बहुत आराम हुआ. जब मिलें हमसे कहें, "बिटिया हमार तो जिन्दगी संवर गयी. क्या बढ़िया तेल बताये हो. इसे लगाने से बाल तो गिरने बंद हो ही गए, साथ में हमारा सर दर्द भी गायब हो गया."

हम खुश हो गए, सुनकर. फिर कुछ वर्षों बाद, हमारे साथ भी वही हुआ. बाल बुरी तरह झड़ने लगे. पर अब तेल मिले कहाँ. कोरोना में तो लॉक डाउन के चलते, घर से निकलना संभव न था.  दुकानें भी लगभग सभी बंद थीं. अब क्या करें. फिर सोचा, टेली मार्केटिंग साइट्स पर देखें . ढूँढना शुरू किया. और आखिरकार हमें वह तेल मिल ही गया. किसी नामचीन कंपनी के प्रोडक्ट्स में लिस्टेड था. खैर हमें उससे क्या करना था. तेल मिल गया, बस हमारी ख़ुशी का ठिकाना न था. तिगुने दाम पर, झट से आर्डर कर दिया. ४, ५ दिन में वह हमारे हाथों में था.  बहुत खुश...!

जब इंस्ट्रक्शन पढने शुरू किये, तो यह क्या. उन्होंने एक ढक्कन नुमा कंघा दिया था, जो उस शीशी के मुहाने पर कसकर, उसी से तेल लगाना था. कंघे में छेद थे, हम चौंके. यह वही तेल है जिसपर लिखा रहता था, हथेली पर कुछ बूँदें लेकर , हलके हलके गीली जड़ों पर मलिए? यहाँ तो शीशी  उड़ेलने की बात हो रही थी...!

खैर हमने तो वही किया जो हमें पता था. पर इस पूरे वाकये से मन में एक विचार कौंधा.  उस तेल के विषय में बहुत कम लोग जानते होंगें. उस प्रसिद्द कंपनी को भी उसकी गुणवत्ता का अंदाज़ हो गया होगा.  उन्होंने सौदा किया होगा. हम आपका पेटेंट ले लेते हैं. नाम वही पुराना रहेगा, पर मार्केटिंग हमारी होगी. भागते भूत की लंगोटी भली. उस तेल के उत्पादक भी तैयार हो गए होंगे, और एक नयी पैकिंग, नयी हिदायतों के साथ वह तेल बाज़ार में उतार दिया गया. वह एक बहुत हो स्ट्रोंग तेल रहा होगा तभी तो कुछ बूँदें, वह भी गीले सर में ही लगाने की हिदायत दी गयी थी. पूरी शीशी का बालों पर क्या असर होगा, इसकी चिंता करना उस कंपनी ने ज़रूरी नही समझा.

बेचनेवालों को केवल अपना उत्पाद बेचने से मतलब है. उससे लोगों को फायदा हो या नुकसान, उन्हें इससे क्या सरोकार ..! जितना अधिक तेल का प्रयोग, उतनी अधिक बिक्री...! बस सारे नियम पहुँच गए ताक पर.

उत्पादकों की हिदायतें दरकिनार कर दी गयीं...!,

और वह तेल लॉन्च हो गया...!

 

सरस दरबारी

 

Thursday, June 10, 2021

दृष्टि, ईश्वर की सबसे अनमोल देन...!



कुछ दिन पहले एक फिल्म देखी थी। दृष्टिहीन बेटी, ब्रैल में कुछ पढ़ रही है। तभी माँ बेटी के कमरे में प्रवेश करती है, और उसे पढ़ता देख लौटने लगती है। बत्ती जली छोड़कर जा ही रही थी, कि तभी, रुककर बेटी को देख, एक नि:श्वास छोड़ बत्ती बुझा देती है। रौंगटे खड़े हो गए थे उस दृश्य में। बिना किसी संवाद के कितनी सूक्ष्मता से उस दृश्य का मर्म दर्शकों तक पहुँच गया था।

हमें अपने घर का अंदाज़ रहता है, क्या चीज़ कहाँ रखी है, बखूबी जानते हैं, पर बावजूद इसके घुप्प अंधेरे में टटोलकर चलते हैं। कितना आसान होता है, चीज़ें खोज लेना, रुपए गिन लेना, सड़क पार कर लेना, सही नंबर की बस, या ट्रेन पकड़कर गंतव्य तक पहुँचना। ईश्वर ने हमें दृष्टि दी हैं। इसलिए यह सब संभव है। ईश्वर न करे, कभी किसी दिन अचानक हम उठें और हमारी दृष्टि हमसे छिन जाए, तो क्या होगा...! कैसे जियेंगे हम...!

क्या कभी हम ईश्वर की दी हुई नेमतों के लिए उसे धन्यवाद कहते हैं। हमारे पास शिकायतों की एक लंबी फेहरिस्त सदा तैयार रहती है। हमें यह नहीं मिला, हम यह नहीं बन सके, हमने ईश्वर का क्या बिगड़ा, वह इतना निष्ठुर क्यों है, उसे हमसे क्या दुश्मनी है, इत्यादि इत्यादि।

क्या कभी किसी दिव्याङ्ग को देखकर मन में यह भाव आया?

 हे प्रभु कितने कष्ट में होगा यह व्यक्ति, इसके कष्ट को दूर करो, या कि, ईश्वर तुम बहुत दयालु हो, तुमने यह अनमोल शरीर दिया है, अपनी कृपा हमपर बनाए रखना। कभी आगे बढ़कर किसी नेत्रहीन को सहारा दे, सड़क पार करने में मदत कीजिये, या सामान खरीदते हुए कोई दुकानदार, बेजा फायदा न उठा ले, इसलिए बस उसके बगल में खड़े हो जायेँ…! करके  देखिये, कितना सुकून मिलता है...! यह सच है, सभी अपने अपने युद्धों में लिप्त हैं, चाहते हुए भी हम सहायता नही कर पाते। पर संवेदनशील तो हो सकते हैं। चलते फिरते इनकी छोटी मोटी सहायता तो कर ही सकते हैं।

किसी अंग का भंग होना बहुत कष्टदायक होता है, जिसमें दृष्टिहीन होना हमें सबसे अधिक कष्टदायक लगता है। कितनी घुटनभरी अंधेरी ज़िंदगी होती है इनकी। जीवन के हर सौंदर्य से वंचित ...!

दृष्टि ईश्वर की सबसे अनमोल देन है। जीते जी न सही हम मृत्युप्रान्त ही उनके लिए कुछ करने का प्रण कर लें। ईश्वर को धन्यवाद कहने का एक नायाब तरीका है। करके देखिये...!

 

सरस दरबारी    

 


Tuesday, June 1, 2021

'स्वर्ग का अंतिम उतार',





प्रसिद्ध कथाकार लक्ष्मी शर्मा जी का एक बेहतरीन उपन्यास, जो अंतिम पन्ने पर पहुँचकर ही छूटता है। 

एक गरीब किसान का बेटा छिगनजिसे  दो पैसे कमाने की खातिर अपना गाँव अपना परिवार छोड़ इंदौर में एक सेठ के घर वॉचमैन की तरह काम करता है। घर के लोग खुश हैं कि उसकी शहर में नौकरी लग गई है, पर छिगन का दिल ही जानता है, चिलचिलाती धूप में घंटो खड़े रहना कितना दुष्कर है। बँगले के फूल क्यारी देख स्मृतियों में रह रहकर घर पहुँच जाता है।L

सेठ की उतरन पहन गाँव में अपना रुतबा बनाये हुए है। कहानी वहाँ से शुरू होती है जब एक दिन उसके मालिक कहते हैं कि उसे अपने साथ चार धाम की यात्रा पर ले जा रहे हैं। छिगन की खुशी का ठिकाना नही रहता। यह वह सपना था जो उसकी दादी देखते देखते दुनिया से कूच कर गयीं। उसकी माता पिता की आँखों में बरसों से यह सपना पल रहा था।  

" छिगन बचपन से देख रहा है बई को बद्रीनाथ के नाम से पाई पाई जोड़ते। हर साल घर के खर्चों से कतर ब्योन्त करती बई कभी पीहर जाना स्थगित करती थी तो कभी घर पर नया छप्पर डलवाना। कई बार तो घर के बच्चे भी मन मारकर मेले बाजार से मुँह जुठाये बिना लौट आते थे, लेकिन किसान और मौसम का सदा का बैर। कभी ओले तो कभी पाला, कभी सूखा तो कभी बरसात, कुछ नही तो कभी तेला लग गया, कभी टिड्डी फिर गईं और ये सब हर बार गरीब की कूलड़ी में पल रहे बचत- शिशु का भोग लेकर ही संतुष्ट होते थे"

ऐसे में चार धाम की यात्रा पर जाने के विचार से छिगन बौरा गया था। 

कितने चाव से उसने मालिक के पूरे परिवार की तस्वीर कॉपी के कागज़ पर बनाई थी। साहब, मेमसाहब, पुरु बाबा, जिया बेबीऔर  थोड़ी दूरी पर अपनी और उनका कुत्ता गूगल जो एक जर्मन शेपर्ड था।

फिर ऐसा क्या हुआ जो उसने उस कागज़ पर बनी सारी तस्वीरें लाल पेन से कोंच डालीं।

धर्मपरायण और कर्तव्यनिष्ठ छिगन की दिल को छू लेने वाली कथा। जिसमें बड़ी ही subtly धर्म और अधर्म के बीच की पारदर्शी रेखा को कथाकार ने उद्घाटित किया है। 

यह उपन्यास कई अहम मुद्दों पर एक पैनी दृष्टि रखकर चलता है...

जैसा गाँवों में साधु संतों द्वारा संचालित कंठी जैसी कुरीतियाँ..!

घर की स्त्रियों के साथ होते कुकृत्य..!

जैसे पानी का महत्व..! 

जैसे गरीबी और भुखमरी किसी तेंदुए से कम नही जो निरीह लोगों को चीर फाड़कर अपना ग्रास बनाती हैं...!

जैसे एक इंसान की मूँछों की ऐंठ उसकी माली हालत से आँकी जाती है...! जिसकी ऐंठसिर्फ एक दिखावा है, आगंतुकों पर रौब झाड़ने के लिए...!

 गरीब कंचन पर  मेमसाहब की उमड़ती दया का भेद जानकर  छिगन पर जो असर होता है वह उपन्यास को एक नया आयाम देता है।

बड़ी सहजता से मानवीय मूल्यों को उद्घाटित करता एक मार्मिक उपन्यास..!

बिंबों के प्रयोग पर तो लक्ष्मी जी को महारथ हासिल है। 

"रात की बारिश और बर्फ रात को ही विदा ले गई है। जानकू चट्टी के पर्वतों पर बिछी बर्फ से गलबहियाँ किये उतरती धूप कुछ ज़्यादा ही साफ और उजली है। उसने ज़रा सा धूपिया पीला उबटन पास बहती जमना की श्यामल वर्णा देह पर भी मल दिया है, जिससे वह निखरी निखरी हो गई है।"

अंत तक बाँधे रखने वाला उपन्यास..!

बधाई लक्ष्मी शर्मा जी..!



Saturday, May 29, 2021

'अकाल में उत्सव '

 


पंकज सुबीर जी की अब तक की सारी कृतियाँ पढ़ चुकी हूँ . हर कृति को एक ही सिटिंग में ख़त्म किया. उनकी गठी हुई शैली और मारक बिंब उनके लेखन को इतना रोचक बना देते  हैं  कि किताब के पन्ने खुद ब खुद पलटते जाते हैं .

अकाल में उत्सव पढ़ते वक़्त शुरुआत में दिमाग कई बार भटका,पर जब कहानी ने गति पकड़ी, तो फिर किताब हाथ से नहीं छूटी. कहानी ख़त्म होते होते नौकरशाहों की पूरी कौम से नफरत हो गयी. नीचता की हर पराकाष्ठा लाँघकर भी यह कैसे सर उठाकर समाज में सम्माननीय व्यक्तियों की तरह जीते हैं, देखकर, पूरे सिस्टम से आस्था उठ गयी.

एक पूरी बिसात बिछी हुई है, सबके खाने तै हैं और सत्ता करती है सुनिश्चित किसे हाथी बनाना है, किसे घोडा , किसे ऊँट - और एक आम आदमी, एक गरीब किसान, उनकी चालों में फँसकर, अपनी जान से हाथ धोकर , उनकी शै और मात का बायस बनता रहता है. न जाने कितने किसान इस सियासी खेल में, काल का ग्रास बन गए , बनते जा रहे हैं .

इस किताब की विशेषता है, इसके मारक वाक्य, जो लेखक बीच बीच में धीरे से कह जाते हैं, और यही वाक्य इस पूरी कहानी का मर्म हैं .

" छोटा किसान जब तक लड़ सकता है, तब तक किसान रहता है और फिर हारकर मज़दूर हो जाता है"

जब बीवी के शरीर से वह आखरी गहना भी उत्तर जाता है, तब किसान पूरी तरह से टूट जाता है।  जब परंपराएं मजबूरी की भेंट चढ़ जाती हैं, जब कोई सहारा शेष नहीं बचता, जब फसल भी ओले और बेमौसम बरसात की भेंट चढ़ जाती है , जब क़र्ज़ की सिल्ली के बोझ से साँसें उखड़ने लगती हैं, तब वह किसानी छोड़, मज़दूर बनने पर विवश हो जाता है , क्योंकि पेट की आग कभी किसी की सगी नहीं होती. एक ऐसा सच जो गले में दर्द की गाँठ सा अटक जाता है  . 

" किसान के जीवन में बढ़ते दुःख उसकी पत्नी के शरीर पर घटते ज़ेवरों से आँक लिए जाते हैं”.

बदहाली में यही गहने तो उसके और उसके भूखे परिवार के लिए एकमात्र सहारा होते हैं, भूखे पेट में  निवाला  होते हैं . हर गहना, फसल कटने पर , फिर छुड़वा लेने की मंशा से गिरवी रखा जाता है, पर अंतत: उसी साहूकार की तिजोरी का निवाला बन जाता है. और दोहरी तिहरी मार से बेदम होता किसान टुकड़े टुकड़े बिखरता जाता है.

"धृतराष्ट्र को हर युग में देखने के लिए संजय की आवश्यकता पड़ती थी, पड़ती है और पड़ती रहेगी".

ओले और बेमौसम बारिश से नष्ट हुई फसल के नुक्सान का आंकलन राजधानी में बैठी सरकार, अपने नियुक्त किये लालची , घुरघों द्वारा – करती है। बिना सच झूठ जाने। सही तो है , बगैर तंत्र के सत्ता पंगु  थी और सदा रहेगी.

" क्रूरता आपको बहुत सारी इमोशनल मूर्खताओं से बचा लेती है ".

एक बहुत ही दुखद मोड़ कहानी का, जब अपनी पत्नी का आखरी ज़ेवर उसके पाँव की तोड़ी , वह सुनार के पास बैठा पिघलवा रहा है. चाँदी की हर रिसती बूँद के साथ उससे जुडी मीठी यादें धुआं होती जा रही है, एक गरीब किसान की  भावनाओं का भी कोई मोल नहीं. सुनार जानता है , कि किसान बहुत मजबूरी में ही गहना तुड़वाता है , उसके आँसू भी उससे छिपे नहीं रहते. पर उसे क्रूर होना पड़ता है, हर इमोशनल मूर्खता से बचे रहने  के लिए। एक और निष्ठुर सच।

दो दृश्य  इस कहानी में लेखक ने अपने कौशल से कालजयी कर दिए हैं.

एक जब वह अपनी पत्नी कमला का आखरी गहना गलवाने सुनार के पास जाता है. उस गहने से जुडी अनगिनत मीठी यादें आँसू बनकर उसके कुर्ते की आस्तीन में जज़्ब होती जाती हैं, उस दर्द की तरह जो उसके भीतर एक आग सा सब कुछ जलाता जाता है। चाँदी की तोड़ी की हर रिसती बूँद, राम प्रसाद का सीना छेदती जाती है , और वह दुखों के महासागर में डूबता उतराता विलाप करता जाता है . कितना करुण है वह दृश्य.

और दूसरा जब वह अपनी पत्नी को बैठाकर, कलेक्टर के दफ्तर से माँगकर लाये हुए पकवान खिलाता है.  दुनिया के मशहूर रोमांटिक सीन्स भी इस एक दृश्य के आगे फीके पड़ जाएंगे . लेखक की कलम ने स्याह रंगों में भी ऐसे रंग भर दिए हैं जो दुरूह है, उस लिपि कुटिया में इतने पुखराज बिखेर दिए हैं , जिनकी आभा कभी फीकी नहीं हो सकती. लेखक ने उस प्रेम मय पल को अमर कर दिया है.

एक बदसूरत सच्चाई को कितनी खूबसूरती से पेश किया जा सकता है, वह ‘अकाल में उत्सव’ को पढ़कर जाना। इस खूबसूरत कलाकृति के लिए पंकज सुबीर जी को अनंत बधाइयाँ और शुभकामनाएँ।   

 

Monday, May 3, 2021

 


२२ मार्च को खबर मिली कि सागर सरहदी नही रहे..!

बहुत ही दुःखद खबर..!

दसवीं कक्षा में थे तबसे जानते थे उन्हें। अक्सर हफ्ते में एक बार घर ज़रूर आते। हर शनिवार गोष्ठियाँ होतीं घर पर, उनमें सागर अंकल भी शिरकत करते। 

उन्हें पैदल चलने का बहुत शौक था। यह उन दिनों की बात है जब वे वर्ली में रहते थे, और हम बांद्रा में। टैक्सियों की स्ट्राइक जब होती तो वे पैदल वर्ली से हमारे घर चले आते। ताज्जुब होता..!

"आप थकते नही', हम अक्सर पूछते। वे हँसकर कहते "चलने से में नही थकता। जितना चाहो चला लो। मेरा पसंदीदा शगल है।"

हम लोगों ने उनका नाम 'पदयात्रा अंकल ' रख दिया था।

एक और खासियत थी उनकी। उनके बाल सफेद और मूँछें बिल्कुल काली थीं। जब भी उनसे पूछा यह कैसे, तो हँसकर कहते, " अरे ये उगीं भी तो 16 साल बाद..!

बाजार और कभी कभी, का ट्रायल दिखाने ले गए थे। तब हम छोटे थे, पहली बार ट्रायल रूम देखा था। 

बहुत सी यादें जुड़ीं हैं उनसे। विवाह पश्चात हम अलाहाबाद आ गए। जब घर जाना होता तब अवश्य मिलने आते। फिर तो वर्षों उनसे भेंट नही हुई। अभी कुछ वर्ष पहले अलाहाबाद आये थे। हमें पता न था। जब अगले दिन अखबार में पढ़ा कि उन्हें अलाहाबाद में 'लाइफटाइम अचीवमेंट' से सम्मानित किया गया है, तो तुरंत पता लगाया कहाँ रुके हैं। वे यात्रिक में रुके थे। जब फ़ोन किया तो रात काफी हो चुकी थी। जब याद दिलाया "अंकल हम सरस बोल रहे हैं", तो उन्हें याद करने में कुछ समय लगा। उनकी बोली से एहसास हो रहा था, कि उम्र ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया है। दिमाग पर ज़ोर दिया। हमने फिर कहा, "अंकल शब्द कुमार जी की बेटी।" एक दम से थकी सी आवाज़ चहक उठी।

" अरे बेटा तुम..!यहाँ कैसे।"

हमने कहा "अंकल शादी करके यहीं तो आये थे।

आपके आने की कोई खबर ही नही मिली नही तो हम भी उस प्रोग्राम में आते, आपको अवार्ड लेता देख, खूब जोरसे तालियाँ बजाते।"

वह हँस दिए, "क्या बताएँ बेटा इन लोगों ने बुलाया और मुझे ले आये। में तो आने की हालत में भी नही था। हमें याद ही नही रहा। उम्र हो गयी है अब। कब आ रही हो मिलने।"

मन हुआ उड़कर पहुँच जाएँ। पर रात बहुत हो चुकी थी, और वे थके हुए थे। हमने कहा "कल सुबह आयेंगे उनके आपसे मिलने।" वे बोले "बेटा हम तो सुबह सुबह निकल जायेंगे"

हम मन मसोसकर रह गए। कहा, "चलिए वहीं मुम्बई आकर ही मिलते हैं।"

मिलना टलता गया। और आज यह खबर..!

इतने प्रसिद्ध थे, उतनी सारी हिट्स दीं, सिलसिला, कभी कभी, बाजार, चाँदनी,इत्यादि। पर लेशमात्र भी घमंड नही था उनमें।

इत्तेफ़ाक़ से हमें गूगल पर उनकी वह तस्वीर मिल गयी, जैसा हमने उन्हें शुरू में देखा था। 

आप हमेशा याद रहेंगे अंकल..!

विनम्र श्रद्धांजलि...!


सरस दरबारी