नन्ही हथेलियाँ गुदगुदाती रेत,
हर बार मुट्ठियों से सरक जाती है
और वह,
उसे मुट्ठियों में भींच
वहां पहुँच जाता है,
जहाँ माँ,
उसका महल बनवा रही है .
मैं भी-
हाथों में रेत भर लेती है,
मुट्ठियाँ भिंचने लगती हैं
वह सरककर डह जाती है.
फिर अंजुरी में भर उसे
हवा के सुपुर्द कर देती हूँ.
पारदर्शी होती रेत ,
चारों ओर भुरभुरा जाती है ....
क्षणार्ध के लिए -
सूरज कई कणों में विभक्त हो जाता है !
और मैं
थककर उस ओर बढ़ जाती हूँ
जहाँ तुम,
एक और महल बनवा रहे हो!!!





